सरपंच-सचिव से कमीशन की दलाली लेकर जनपद अधिकारी कर देते हैं फर्जी बिल पास?
जनपद चांवरपाठा (नरसिंहपुर) में विकास की राशि पर सवाल, गरीबों के हक की रकम पर ‘होली’ की चर्चा
सरकार हर साल पंचायतों के माध्यम से करोड़ों रुपये गांवों के विकास के लिए भेजती है। इन पैसों का उद्देश्य सड़क, नाली, पेयजल, स्वच्छता और अन्य मूलभूत सुविधाओं को मजबूत करना होता है। लेकिन जब यही पैसा कागज़ों के बिलों और फाइलों में सिमटकर रह जाए, तो लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
कागज़ों में विकास, जमीन पर सवाल
जनपद चांवरपाठा क्षेत्र में कई ग्रामीणों के बीच यह चर्चा सुनने को मिल रही है कि कुछ पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर बिल तो पास हो जाते हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर दिखाई नहीं देता। कहीं अधूरे निर्माण, कहीं घटिया सामग्री, और कहीं तो केवल कागज़ों में ही योजनाएं पूरी दिखा दी जाती हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यही उठता है कि यदि सब कुछ सही है, तो फिर गांवों में इतनी शिकायतें क्यों उठ रही हैं? क्या वास्तव में पंचायतों से आने वाले बिलों की गंभीर जांच होती है, या फिर फाइलें केवल औपचारिकता निभाकर आगे बढ़ जाती हैं?
क्या कमीशन का खेल हावी है?
ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि कई मामलों में विकास कार्यों की गुणवत्ता से ज्यादा महत्व कथित तौर पर कमीशन के प्रतिशत को दिया जाता है। यानी जितना बड़ा हिस्सा, उतनी जल्दी फाइल आगे बढ़ने की संभावना।
हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तेजी से यह बातें फैल रही हैं उसने स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
गरीबों के हक की रकम पर ‘चांदी के सिक्कों’ की चमक?
सरकारी योजनाओं का उद्देश्य ग्रामीणों की जिंदगी आसान बनाना होता है। लेकिन अगर वही राशि कुछ लोगों के लिए चांदी के सिक्कों की चमक बन जाए, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन गरीब परिवारों को होता है जिनके लिए ये योजनाएं बनाई जाती हैं।
लालच के इन दरिंदों से बचना नामुमकिन?
ग्रामीणों का कहना है कि जब शिकायत की जाती है तो कार्रवाई की प्रक्रिया इतनी जटिल और धीमी होती है कि कई लोग आगे आने से ही डरने लगते हैं। यही वजह है कि कुछ लोग यह कहने लगे हैं कि लालच के इन दरिंदों से बचना अब लगभग नामुमकिन सा हो गया है।
अब निगाहें प्रशासन पर
यदि वास्तव में ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं, तो प्रशासन के लिए जरूरी है कि पंचायत स्तर पर हुए विकास कार्यों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए। भौतिक सत्यापन से यह स्पष्ट हो सकता है कि विकास की राशि सही तरीके से खर्च हुई है या नहीं।
यदि सब कुछ सही है तो सच्चाई सामने आनी चाहिए, और यदि कहीं गड़बड़ी है तो जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई भी होनी चाहिए। क्योंकि यह पैसा किसी अधिकारी या नेता का नहीं, बल्कि उन गरीब ग्रामीणों का है जिनके सपनों का नाम ही विकास है।
