नरसिंहपुर से नरक की यात्रा?
वैसे तो आप ने भी नरसिंहपुर से कभी न कभी बस यात्रा की ही होगी!
बस स्टेंड के हालात से भी अच्छे से परिचित होंगे, , प्रतीक्षालय में शराबखोरी है, महिलाओं को निस्तार के लिए खुले में जाना पड़ता है, ,बस कंडक्टर अधिकतर टिकिट नहीं देते हैं, , बस स्टैंड पर खुले में बिकने वाली खाद्य सामग्री के प्रदूषित होने की संभावना जैसी समस्याओं से कभी न कभी आपका भी सामना हुआ ही होगा!
लेकिन जिस बस में आप बैठे हों उसके इमरजेंसी एग्जिट गेट को रस्सियों से बांधकर रखा गया हो, और बस के फर्श का हिस्सा आपके पैरों के यहां से गायब हो तो जान हलक में आ जाना स्वाभाविक है!
बच गए तो ठीक मंजिल तक पहुंच ही जाएंगे, , और निबटे तो पहचान भी मुश्किल क्यों कि कंडक्टर ने तो टिकिट ही नहीं दी थी, , मुआवजे की तो आस ही छोड़ दीजिएगा!
बसों की फिटनेस आखिर कौन जांचता है?
अब सवाल यह है कि आखिर इन बसों की फिटनेस कौन जांचता है?
कागजों में तो हर बस “फिट” होती है, , लेकिन सड़क पर उतरते ही ऐसा लगता है जैसे यह बस नहीं बल्कि किसी कबाड़खाने से निकाला गया चलता-फिरता ढांचा हो!
यात्रियों की जान की कीमत क्या है?
क्या सिर्फ इतना कि किसी तरह बस भर जाए और डीजल निकल आए?
अगर रास्ते में कोई बड़ा हादसा हो जाए तो जिम्मेदार कौन होगा?
- बस मालिक?
- कंडक्टर?
- या फिर वह सिस्टम जो आंख बंद करके इन खटारा बसों को सड़कों पर दौड़ने की अनुमति दे देता है?
प्रशासन की नजरों के सामने सब?
हैरानी की बात यह भी है कि प्रशासन की नजरों के सामने ही यह सब होता है!
बस स्टैंड पर खड़ी बसों की हालत किसी से छुपी नहीं है, , लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा ही दिखाई देता है।
ऐसे में आम यात्री आखिर करे तो क्या करे? घर से निकले तो मंजिल तक पहुंचने की उम्मीद करे या भगवान का नाम लेकर “नरसिंहपुर से नरक की यात्रा” पर निकल पड़े?
क्योंकि यहां सफर का भरोसा नहीं, , सिर्फ किस्मत का सहारा है!
