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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

होली पर रंग से ज्यादा नशे का चढ़ा खुमार?

जमकर बिकी भांग, कुल्फी और गांजे की पुड़िया, हुड़दंगियों ने सड़कों पर किया खुलेआम सेवन


🎨 रंगों का त्योहार या नशे का बाजार?

जिले भर में होली के अवसर पर जहां एक ओर रंग, अबीर और गुलाल की खुशबू फैलनी चाहिए थी, वहीं कई स्थानों पर नशे का कारोबार खुलेआम चलता नजर आया। बाजारों और गली-कूचों में भांग की कुल्फी, ठंडाई और गांजे की पुड़िया की बिक्री ने त्योहार की मर्यादा पर सवाल खड़े कर दिए।

“त्योहार प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है, लेकिन कुछ हुड़दंगियों ने इसे नशे और उपद्रव का माध्यम बना दिया।”

🚨 हुड़दंग और कानून व्यवस्था पर सवाल

कई मोहल्लों में नशे में धुत युवकों द्वारा सड़कों पर हंगामा, तेज आवाज में डीजे और राहगीरों से बदसलूकी की छुटपुट शिकायतें सामने आईं! स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन की मौजूदगी के बावजूद नशे का खुलेआम सेवन रोकने में सख्ती नजर नहीं आई!

👩 महिलाओं और बुजुर्गों में असुरक्षा की भावना

त्योहार के दौरान कुछ स्थानों पर महिलाओं और बुजुर्गों ने असहज माहौल की बात कही। उनका कहना है कि होली जैसे पावन पर्व पर सुरक्षा और मर्यादा सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

“होली की आड़ में हुड़दंग और नशाखोरी को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।”

📌 प्रशासन के लिए चुनौती

सवाल यह है कि क्या हर साल की तरह इस बार भी होली के बाद मामला ठंडा पड़ जाएगा, या फिर नशे और अव्यवस्था पर सख्त कार्रवाई होगी? समाज के जिम्मेदार नागरिकों का मानना है कि त्योहार की गरिमा बनाए रखने के लिए सामूहिक जागरूकता और प्रशासनिक सख्ती दोनों जरूरी हैं।

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