पत्रकारों को मिला सिर्फ 250 ग्राम गुजिया का “सम्मान”!
क्या पत्रकारों की मेहनत और ईमानदारी सिर्फ मिठाई के पैमाने पर मापी जाएगी?
सोशल मीडिया पर यूपी का वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें पत्रकार लोग मिठाई का डब्बा लौटाते हुए नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि मिनिस्टर साहब के यहां से फोन किया जा रहा था — “आइए, आपको होली का गिफ्ट दिया जाएगा।” और अंत में मिला 250 ग्राम गुजिया का “सम्मान”!
सवाल सीधा है — क्या पत्रकार सिर्फ खबरें लाने की मशीन हैं? क्या उनका हक सिर्फ मिठाई और उपहार के रूप में तय होता है?
बात पैसों या मिठाई की नहीं है। यह उस व्यथा का सवाल है जो हर पत्रकार रोज महसूस करता है। उनकी मेहनत, उनकी सच्चाई, उनकी जद्दोजहद — क्या ये किसी के लिए मायने रखती है? या सिर्फ चमकदार गिफ्ट और दिखावटी सम्मान ही समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं?
लोग तरह तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं, कुछ अपशब्द तक लिख रहे हैं। लेकिन क्या यही पत्रकारों के प्रति समाज की समझ है? क्या उनकी गरिमा हमेशा तख्तों पर तुच्छ गिफ्ट के वजन से ही नापी जाएगी?
क्या पत्रकार सिर्फ खबर लाने वाला कोई रोबोट है?
और अंत में सबसे बड़ा सवाल — क्या पत्रकारों की गरिमा तब तक पीछे रहेगी, जब तक उन्हें समाज और सत्ता से असली सम्मान नहीं मिलता? क्या पत्रकार सिर्फ खबरें फैलाने वाले रोबोट हैं, या उन्हें इंसानियत और गौरव का हक भी है?
सोचिए — हर खबर जो उन्होंने लायी, हर सच्चाई जो उन्होंने सामने रखी, हर सवाल जो उन्होंने उठाया, क्या ये सब सिर्फ एक 250 ग्राम गुजिया के मुक़ाबले कमतर हैं? क्या उनकी मेहनत, उनकी ईमानदारी, उनके खून-पसीने का मूल्य इतना तुच्छ है कि इसे केवल दिखावे और उपहार से मापा जाए?
अंत में — पत्रकार केवल खबरें नहीं लाते। वे समाज की आत्मा की आवाज़ हैं। अगर उनकी आवाज़ को तुच्छ “गिफ्ट” और दिखावे से दबाया जाएगा, तो क्या बची रहेगी वो सच्चाई जो समाज को चाहिए? और क्या हम, समाज के लोग, कभी समझ पाएंगे कि असली सम्मान सिर्फ हाथ में मिठाई नहीं, बल्कि उनके पेशे की गरिमा और ईमानदारी में छिपा है?
