“सवालों से डरने वाला धर्म आखिर कितना मजबूत है?”
आप यूट्यूबर सलीम वास्तिक को जानते होंगे। सलीम खुद को पूर्व मुस्लिम बताते हैं और अपने वीडियो में मुस्लिम धर्म की कुरीतियों पर सवाल उठाते हैं।
बुनियाद अली के दोनों बेटे — जीशान और गुफरान — जब सलीम के वीडियो देखते, तो गुस्से से भर जाते। गुस्सा इतना कि उन्होंने तय कर लिया — सलीम को मार देना है।
दोनों बाइक से गाजियाबाद पहुंचे और सलीम पर हमला कर दिया। चाकू से पेट, पीठ, सीना, गर्दन — हर जगह ताबड़तोड़ वार किए। हालांकि बाद में पुलिसिया कार्रवाई में दोनों ढेर हो गए।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती… असली सवाल यहीं से शुरू होता है।
एक वीडियो… कुछ सवाल… और जवाब में हत्या की योजना! अगर किसी विचार से असहमति है तो उसका जवाब तर्क और बहस से दिया जा सकता है। लेकिन जब जवाब चाकू और खून बन जाए, यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं — यह विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।
कट्टरता का असली चेहरा
कट्टरता हमेशा एक ही काम करती है — वह अपने अनुयायियों को सोचने नहीं देती। उन्हें यह सिखाया जाता है कि जो सवाल पूछे, वह दुश्मन है। जो आलोचना करे, उसे खत्म कर दो। यहीं से समाज में डर का माहौल पैदा होता है।
धर्म तब मजबूत होता है जब वह सवालों का जवाब देता है… कमजोर तब दिखता है जब वह सवाल पूछने वाले से डर जाता है।
मीडिया की चुप्पी और दोहरे मानक
मीडिया और सामाजिक मंच अक्सर ऐसे मामलों में चुप रहते हैं, खासकर जब यह किसी संवेदनशील धर्म या समुदाय से जुड़ा हो।
इसका मतलब यह नहीं कि घटना महत्वहीन है, बल्कि यह सवालों और आलोचना से डर के माहौल का संकेत है।
सामाजिक डर और “कौन-किस पर बोल सकता है” की सोच ने चुप्पी पैदा कर दी है।
ख़ामनेई की मौत पर विलाप करने वालों को देखकर मीडिया बोलता है, लेकिन सलीम पर हमले पर चुप्पी साधे बैठा है। यह केवल लापरवाही नहीं, यह सवालों और आलोचना से डर की मानसिकता को उजागर करता है।
एक तरफ़ राजनीतिक बयानबाज़ी सहन की जाती है, दूसरी तरफ़ व्यक्तिगत सवाल पर हत्या की धमकी दी जाती है। यही है असली दोहरा मानक।
देश का रास्ता साफ है
भारत कोई भीड़ का राज नहीं है। यह देश कानून और संविधान से चलता है। हर नागरिक को बोलने, लिखने और सवाल पूछने का अधिकार है। अगर किसी को किसी विचार से आपत्ति है, तो अदालत है, कानून है, बहस है। लेकिन अगर आलोचना का जवाब हिंसा से दिया जाएगा, तो यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं — यह लोकतंत्र की आत्मा पर हमला होगा।
सवालों से डरने वाली सोच इतिहास नहीं बनाती — इतिहास उसे पीछे छोड़ देता है।
