वसुधैव कुटुंबकम्… लेकिन आज ये वो भारत नहीं है?
विशेष संपादकीय | 2026 का भारत
लेखक/पत्रकार:विक्रम सिंह राजपूत
वसुधैव कुटुंबकम्—यह कभी केवल संस्कृत का एक वाक्य नहीं था। यह भारत की सोच थी, उसकी आत्मा थी, उसकी सामूहिक चेतना थी। यह वह भाव था, जिसमें पूरी दुनिया एक परिवार मानी जाती थी। लेकिन आज यह भाव दीवारों से टकराकर लौट आता है।
आज यह वाक्य मंचों से बोला जाता है, भाषणों में दोहराया जाता है, लेकिन व्यवहार में कहीं दिखाई नहीं देता। आज शब्द ज़िंदा हैं, पर संवेदनाएँ थक चुकी हैं।
आज हम एक-दूसरे को इंसान नहीं, पहचान के खांचे में देखकर तय करते हैं—कौन अपना है और कौन पराया।
कहीं हिन्दू और मुसलमान आमने-सामने खड़े कर दिए जाते हैं, कहीं हिन्दू समाज के भीतर ही जाति के नाम पर खाई गहरी होती जा रही है। कहीं आदिवासी अपनी अलग पहचान की बात कर रहे हैं, और कहीं उनकी पीड़ा को समझने के बजाय उस पर राजनीति की जा रही है।
आज हम एक-दूसरे को पहचान से नहीं,
पहले धर्म, फिर जाति, फिर वर्ग से तौलते हैं।
इंसान बाद में आता है—
लेबल पहले।
कहीं हिन्दू–मुसलमान के नाम पर आग है,
तो कहीं हिन्दू ही हिन्दू से लड़ रहा है।
कहीं जाति ऊँची–नीची है,
तो कहीं आदिवासी कह रहा है—
“हम तुमसे अलग हैं।”
अलग…
कब और कैसे हो गए हम इतने अलग?
यह 2026 का भारत है— जहाँ तकनीक तेज़ है, लेकिन सोच संकीर्ण होती जा रही है। जहाँ सोशल मीडिया पर आवाज़ें बुलंद हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर संवाद मरता जा रहा है।
हमने असहमति को दुश्मनी बना लिया और सवाल पूछने वालों को संदिग्ध।
आज मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर तो सुरक्षित हैं, लेकिन उनके बीच खड़ा इंसान सबसे ज़्यादा असुरक्षित है। आज किसी का नाम, उसकी जाति या उसकी पूजा-पद्धति उसके जीवन और मृत्यु का कारण बन सकती है।
विविधता, जो कभी भारत की ताकत थी, आज राजनीति के लिए सबसे आसान औज़ार बन चुकी है। हमने विविधता को समझने का धैर्य खो दिया है, और उसे भुनाने की होड़ में लग गए हैं।
वसुधैव कुटुंबकम् का अर्थ था—दूसरे के दर्द में अपना दर्द देखना; आज उसका अर्थ रह गया है—दूसरे के दर्द पर मौन।
शायद दोष केवल शासन या व्यवस्था का नहीं है। दोष हमारा भी है। हमने नफ़रत को नज़रअंदाज़ किया, चुप्पी को समझदारी कहा और संवेदना को कमज़ोरी मान लिया।
अगर यही चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ियाँ वसुधैव कुटुंबकम् को एक सुंदर संस्कृत पंक्ति की तरह तो जानेंगी, लेकिन उसे जीना नहीं सीख पाएँगी।
अगर एक-दूसरे का खून बहाने वाला समाज भी वसुधैव कुटुंबकम् बोले, तो सवाल शब्दों पर नहीं, हमारे चरित्र पर उठता है।
शायद अभी भी समय है—
न नारे बदलने का,
न झंडे बदलने का,
बल्कि नियत, नजरिया और संवेदना बदलने का।
