ब्राह्मण और राजपूतों को गालियां!
ये कैसा यूजीसी का समर्थन?
यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद इसके समर्थन में उतरे प्रदर्शनकारी नैतिकता की तमाम हदों को पार करते नजर आ रहे हैं। यह आरोप नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वे वीडियो हैं, जिन्हें देखकर कोई भी संवेदनशील नागरिक विचलित हो सकता है।
इन वीडियो में कहीं मंच से नारे लगते सुनाई देते हैं —
“तिलक, तराजू और तलवार… इनको मारो जूते चार”
तो कहीं यह कहते हुए लोग दिखाई देते हैं कि —
“ब्राह्मणों से जूते साफ करवाने चाहिए”
ये शब्द किसी बंद कमरे की बातचीत नहीं हैं, बल्कि माइक, मंच और कैमरे के सामने बोले जा रहे हैं — और वह भी यूजीसी के समर्थन के नाम पर।
सवाल यह नहीं है कि किसी को यूजीसी का समर्थन करने का अधिकार है या नहीं, सवाल यह है कि क्या किसी संवैधानिक संस्था के समर्थन के लिए जातीय अपमान, नफरत और हिंसा की भाषा को वैध ठहराया जाएगा?
इन नारों में न शिक्षा का स्वर है, न ही सामाजिक न्याय की कोई स्पष्ट मांग — यह साफ तौर पर ब्राह्मण और राजपूत समुदाय को निशाना बनाने की संगठित मानसिकता को दर्शाता है।
इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि स्वर्ण पत्रकारों के साथ अभद्रता, धक्का-मुक्की और धमकियों के अनेक वीडियो भी सामने आए हैं। यानी अब सवाल पूछना भी जाति देखकर तय होगा?
अगर पत्रकार सवाल करेगा तो उसे उसकी जाति याद दिलाई जाएगी — तो फिर सच कौन लिखेगा?
सबसे बड़ा प्रश्न प्रशासन और तथाकथित नैतिक ठेकेदारों से है — क्या जाति विशेष को गाली देना अब स्वीकार्य अभिव्यक्ति बन चुका है?
अगर आज खुलेआम कहा जा रहा है कि “ब्राह्मणों से जूते साफ करवाने चाहिए”, तो कल यह आग किस दरवाज़े तक पहुंचेगी?
विरोध विचारों से होना चाहिए, पहचान से नहीं। वरना यह आंदोलन नहीं, समाज को तोड़ने की साजिश कहलाएगा।
