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Stringer24News | सम्पादकीय

यह हादसा नहीं था

यह तय था कि किसी दिन कोई मरेगा!

बारहबड़ा रोड पर एक आदमी मरा।
नर्मदा प्रसाद।

मत पूछिए कैसे।
यहां लोग रोज़ मरते हैं।

रेत का डंपर आया।
बाइक थी।
आदमी था।
बस खत्म।

ड्राइवर भाग गया।
जैसे उसे पता हो —
यहां भाग जाना ही सबसे सुरक्षित है।

यह डंपर पहली बार नहीं दौड़ा था

यह वही रोड है
जहां रोज़ रेत निकलती है।

रोज़ 80 की स्पीड।
रोज़ ओवरलोड।
रोज़ गांव के बीच से।

कभी किसी ने नहीं पूछा —
इतनी रेत जा कहां रही है?

सब जानते हैं,
पर सब चुप हैं।

रेत नदी से नहीं, सिस्टम से निकलती है

नदी तो कब की खत्म हो गई।

अब रेत
थाने से निकलती है,
दफ्तर से निकलती है,
और सड़क पर दौड़ती है।

डंपर पर नंबर प्लेट है,
पर डर नहीं।

आज लाश है, इसलिए खबर है

आज पुलिस आई।
आज डंपर जब्त हुआ।
आज बयान दिए गए।

कल फिर
सब सामान्य।

डंपर फिर चलेगा।
किसी और के ऊपर।

सीधा सवाल, सीधा जवाब

अगर यह सब गलत है,
तो चल कैसे रहा है?

अगर चल रहा है,
तो गलत क्यों कहा जाता है?

और अगर मरना तय है,
तो अगला नंबर किसका है?

यह खबर नहीं है

यह चेतावनी है।

यह बारहबड़ा की कहानी नहीं है।
यह पूरे जिले का सच है।

और जब अगली बार
फिर कोई मरेगा,
तो हम फिर लिखेंगे —

“ड्राइवर फरार है।”

क्योंकि यहां
सबसे तेज़ चीज़
डंपर नहीं,
फरारी है।

यह सिर्फ़ एक मौत नहीं है

यह उस सिस्टम का आईना है
जो जानता सब कुछ है,
लेकिन करता कुछ नहीं।

खनिज विभाग जानता है
कहां से रेत निकल रही है।

पुलिस जानती है
कौन-सी गाड़ियाँ अवैध हैं।

प्रशासन जानता है
किस सड़क से मौत दौड़ती है।

फिर भी
डंपर चलता है।

आज नर्मदा प्रसाद मरा है,
कल कोई और होगा।

जब इंसान की जान सस्ती हो जाए

सबसे डरावनी बात यह नहीं
कि अवैध रेत खनन चल रहा है।

सबसे डरावनी बात यह है
कि अब ऐसी मौतें
हमारे लिए खबर भर रह गई हैं।

कुछ देर शोर,
कुछ बयान,
कुछ कार्रवाई का दिखावा —
और फिर सब सामान्य।

लेकिन जिस घर में
आज चूल्हा नहीं जला,
वह “सामान्य” नहीं होगा।

© Stringer24 News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी
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