सत्ता, सवाल और सच्चाई
बीजेपी के ही नेता-अधिकारी लगा रहे थे मनरेगा को पलीता?
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यह कहना कि “मनरेगा से गांवों का विकास हुआ ही नहीं, इसका दुरुपयोग किया गया” केवल एक बयान नहीं है, बल्कि यह अपनी ही सरकार के कार्यकाल पर खड़ा किया गया सबसे बड़ा सवाल है।
पहले यह स्पष्ट हो — दुरुपयोग कौन कर रहा था?
जिस समय मनरेगा का कथित दुरुपयोग हो रहा था, उस समय प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी। गांव में सरपंच-सचिव, ब्लॉक में जनपद सीईओ, जिले में जिला पंचायत अधिकारी और कलेक्टर — सब इसी शासन तंत्र का हिस्सा थे।
हर स्तर से यही कहा जाता रहा — “सब ठीक चल रहा है।”
अगर सब ठीक चल रहा था, तो फिर अब यह स्वीकारोक्ति क्यों? और अगर दुरुपयोग हो रहा था, तो उस समय रिपोर्ट ठीक बताने वाले अफसर झूठ बोल रहे थे या जानबूझकर आंख मूंदे बैठे थे?
आंकड़े चमकते रहे, विज्ञापन चलते रहे
मनरेगा के आंकड़े हर साल चमकते रहे, सरकारी विज्ञापनों में इसे ग्रामीण विकास की रीढ़ बताया जाता रहा। करोड़ों रुपये प्रचार पर खर्च हुए।
तब यह योजना सफल थी — और आज वही योजना दुरुपयोग की मिसाल कैसे बन गई?
अगर मनरेगा फेल थी, तो झूठे आंकड़े क्यों परोसे गए? और अगर सफल थी, तो अब उसे बदनाम क्यों किया जा रहा है?
सच यह है कि यह दुरुपयोग किसी विपक्ष ने नहीं किया। यह सरकारी संरक्षण, प्रशासनिक मिलीभगत और राजनीतिक चुप्पी का परिणाम था।
पहले तो मनरेगा मॉडल योजना थी, और अब वही योजना असफलता का ठीकरा बन गई है!
सवाल योजना पर नहीं है — सवाल यह है कि जब सब ठीक बताया जा रहा था, तब झूठ क्यों बोला गया? और अब जब गोलमाल की बात हो रही है, तो जिम्मेदारी कौन लेगा?
