बरमान मेले की छवि पर सवाल?
रुद्रेश तिवारी, सुनीता पटेल और जगदीश पटेल के बयान — क्या कहता है लोकतांत्रिक संविधान?
हाल ही में घटित हुए बरमान थप्पड़ कांड में अब एक अलग ही एंगल सामने निकलकर आ रहा है। यह मामला अब सिर्फ एक वायरल वीडियो या क्षणिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक आचरण, संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
सोशल मीडिया पर मौजूद पोस्ट और वीडियो को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे घटनाक्रम को एक विशेष दिशा में मोड़ने की कोशिश की जा रही है! ऐसे ही एक वीडियो में यह दावा किया गया कि बरमान थप्पड़ कांड दरअसल कांग्रेस और कुछ सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा बरमान मेले की छवि बिगाड़ने की साजिश है!बरमान मेला बिगाड़ने की साजिश और IAS अधिकारी के विरुद्ध सोशल मीडिया दुष्प्रचार की जांच एवं कार्यवाही की मांग जिला पुलिस अधीक्षक से एक ज्ञापन के माध्यम से की गई है।
संविधान की नजर से देखें, राजनीति की नहीं — जगदीश पटेल
जब इस विषय पर माकपा एवं किसान नेता जगदीश पटेल से फोन पर चर्चा की गई और यह सवाल पूछा गया कि क्या यह घटना किसी राजनीतिक साजिश का हिस्सा हो सकती है, तो उन्होंने कहा—
“उक्त घटना को जातिगत, धार्मिक या राजनीतिक रंग दिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। वीडियो में स्पष्ट रूप से देखा गया कि जिला पंचायत अधिकारी गजेंद्र नागेश द्वारा मानवीय भूल करने वाले युवक से हाथापाई की गई और स्थानीय पंडित जी से अभद्रता की गई। यह अनुचित है। इसे संवैधानिक नजरिए से देखा जाना चाहिए, न कि धार्मिक या स्वार्थ के नजरिए से।”
मानवीय भूल पर हिंसक रवैया अस्वीकार्य — रुद्रेश तिवारी
वहीं इस सवाल के जवाब में नेता प्रतिपक्ष Er. रुद्रेश तिवारी ने आस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच स्पष्ट रेखा खींचते हुए कहा—
“मां नर्मदा हम सभी के लिए पूजनीय हैं, वे जीवनदायिनी हैं और उन्हें प्रदूषण रहित एवं संरक्षित करने की जवाबदेही प्रत्येक नागरिक की है। किन्तु किसी मानवीय भूल हो जाने पर एक आईएएस अधिकारी का यह रवैया किसी भी कीमत पर सही नहीं कहा जा सकता। इससे भी अधिक दुख की बात यह है कि अधिकारी की ओर से कोई अफसोस जताने वाला बयान तक सामने नहीं आया। उल्टा, इस अनुचित कृत्य को तर्कों के सहारे जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। यह बड़ी विडंबना है।”
प्रशासन को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए था — सुनीता पटेल
पूर्व विधायक गाडरवारा श्रीमती सुनीता पटेल से फोन पर साक्षात्कार का प्रयास किया गया। इस दौरान ‘मझले भैया’ से भी फोन पर चर्चा हुई और उनके द्वारा सवाल के जवाब में कहा गया—
“कांग्रेस हो या बीजेपी या फिर सामान्यजन — मां नर्मदा सभी के लिए पूजनीय हैं। किसी प्रशासनिक अधिकारी से गैर-जिम्मेदाराना रवैए की उम्मीद नहीं की जा सकती। होना तो यह चाहिए था कि प्रशासन वायरल वीडियो को स्वतः संज्ञान में लेकर जांच और कार्यवाही करता, लेकिन शासन-प्रशासन द्वारा अब तक कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की गई।”
यह पूरा मामला अब किसी एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में पद और सत्ता पर बैठे लोग मानवीय भूल पर हिंसा के अधिकारी हो सकते हैं? और यदि नहीं, तो ऐसे मामलों में संविधान की रक्षा कौन करेगा?
