सांप निकल गया और लाठी पीटते रह गए!
बरमान थप्पड़ कांड | नरसिंहपुर
“सांप निकल गया और लाठी पीटते रह गए” — यह कहावत बरमान थप्पड़ कांड पर सटीक बैठती है। जिला पंचायत सीईओ गजेंद्र नागेश द्वारा जिस युवक को थप्पड़ रसीद किए गए और जिन पंडित जी के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग हुआ, अब वे दोनों ही इस पूरे मामले से दूरी बना चुके हैं। यह भी साफ कह दिया गया है कि अब वे किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं चाहते।
यहां शासन-प्रशासन का उपेक्षित रवैया जनता को आहत कर गया।
होना तो यह चाहिए था कि नैतिकता के आधार पर सीईओ गजेंद्र नागेश अपने इस कृत्य पर माफी मांगते। लेकिन माफी तो दूर, अगले ही दिन सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में वे अपनी हरकत को जायज ठहराने के लिए अजीब तर्क देते नजर आए —
“गुंडों को हम नहीं मारेंगे तो कौन मारेगा?”
काश! इतनी ही जिम्मेदारी और तल्लीनता ग्राम पंचायत क्षेत्रों में चल रहे अवैध रेत खनन पर भी दिखाई जाती। लेकिन वहां सीईओ साहब की लाठी खामोश रहती है, और यहां एक गरीब, कमजोर व्यक्ति पर प्रशासनिक रौब पूरी ताकत से बरसता है।
हालांकि पंडित जी और मांझी समाज के युवक के बयान सामने आने के बाद शासन-प्रशासन ने राहत की सांस जरूर ली — मानो असली मुद्दा खत्म हो गया हो!
राजनीति गरमाई, सवाल जिंदा हैं
इधर कांग्रेस ने लगातार कार्रवाई की मांग करते हुए धरना-प्रदर्शन किया। मांझी समाज ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया। वरिष्ठ पत्रकार एवं मांझी समाज नेता अमर नौरिया ने आक्रामक अंदाज में सवाल उठाए।
ग्राम पंचायतों में बेलगाम भ्रष्टाचार पर सीईओ की नाकामी को खुलकर उजागर किया गया।
पूर्व विधायक एवं कांग्रेस नेत्री श्रीमती सुनीता पटेल द्वारा 5 जनवरी से अनिश्चितकालीन धरना प्रारंभ कर दिया गया है। धरना स्थल से सामने आई भोजन की तस्वीरें इशारा कर रही हैं कि यह आंदोलन लंबा चल सकता है।
अब सवाल कौन पूछे?
जब कथित पीड़ित ही अब कार्रवाई नहीं चाहते, तो शिकायतकर्ता कौन है? क्या प्रशासनिक मर्यादा का कोई मोल नहीं? या फिर मामला ठंडे बस्ते में डालने की पटकथा पहले से तैयार थी?
इस पूरे घटनाक्रम ने स्थानीय मीडिया के भीतर मौजूद खाई को भी उजागर कर दिया। मीडिया दो खेमों में बंटा हुआ साफ दिखाई दिया।
नर्मदा: भक्ति या राजनीति?
नर्मदा के नाम पर राजनीति करना, चेहरे चमकाना और फिर रेत खनन से लेकर कुर्सी तक पहुंच जाना — यह किसी से छुपा नहीं है!
नर्मदा भक्ति की आड़ में मां नर्मदा को अब तक सिर्फ क्षरण मिला है। गर्मियों में कई जगह धारा टूट जाती है, सहायक नदियां किसी तरह इसे आगे बढ़ाती हैं।
नर्मदा को बचाना किसी एक की जिम्मेदारी नहीं, यह हर नागरिक का कर्तव्य है।
अगले अंक में जारी.......
सत्य और समाज के बीच की कड़ी
