ग्राम रांकई को संदेह की नजरों से क्यों देखा जाता है?
— एक इतिहास, एक वर्तमान और कई अनकहे सवाल
नरसिंहपुर जिले के करेली जनपद के अंतर्गत आने वाला ग्राम रांकई। एक सामान्य ग्रामीण भूगोल, खेती-किसानी, रोज़मर्रा की ज़िंदगी और अपने-अपने संघर्षों में उलझा हुआ गांव। लेकिन इसके नाम के साथ पिछले कुछ वर्षों में संदेह, आशंका और भय जैसे शब्द भी अनायास जुड़ते चले गए।
यह गांव अल्पसंख्यक बाहुल्य है — यह एक सामाजिक तथ्य है, अपराध नहीं। लेकिन भारत जैसे देश में, जहां बीते डेढ़ दशक में आतंकवाद और सुरक्षा जैसे शब्दों ने आम जनमानस की सोच को गहराई से प्रभावित किया है, वहां किसी गांव की पहचान कई बार उसके वर्तमान से अधिक उसके अतीत के कुछ पन्नों से तय कर दी जाती है।
इतिहास का वह दौर, जिसने छाया बना दी
इंटरनेट और पुराने आधिकारिक रिकॉर्ड्स में उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, 2008 से 2011 के बीच मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में प्रतिबंधित संगठन सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन (IM) के नेटवर्क के खुलासे हुए थे। इसी दौर में नरसिंहपुर जिले के रांकई गांव का नाम भी संदिग्ध गतिविधियों के संदर्भ में सामने आया!
बताया जाता है कि सिमी के शीर्ष नेता सफदर नागौरी की गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ में मालवा क्षेत्र के साथ-साथ महाकौशल (जबलपुर, नरसिंहपुर) के कुछ गांवों का उल्लेख हुआ था! इसी कड़ी में सुरक्षा एजेंसियों — ATS और STF — ने रांकई में दबिश दी और कुछ लोगों को पूछताछ के लिए पकड़ा गया! आरोप यह थे कि कुछ लोग संगठन के लिए बैठकें आयोजित करने और युवाओं को गुमराह करने का प्रयास कर रहे थे!
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ये कार्रवाइयाँ कुछ व्यक्तियों तक सीमित थीं, न कि पूरे गांव या समुदाय पर कोई आरोप।
खंडवा जेल ब्रेक और बढ़ी हुई सतर्कता
साल 2013 में जब खंडवा जेल से सिमी के आतंकी फरार हुए, तब पूरे मध्य प्रदेश में हाई अलर्ट घोषित किया गया था। नरसिंहपुर जिला भी इससे अछूता नहीं रहा। उस समय रांकई और आसपास के इलाकों में सर्च ऑपरेशन चलाए गए, क्योंकि आशंका जताई जा रही थी कि फरार आतंकियों को स्थानीय स्तर पर मदद मिल सकती है!
इन घटनाओं का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव यह हुआ कि गांव की छवि पर एक स्थायी सा दाग लग गया। एक ऐसा दाग, जो समय के साथ धुंधला तो हुआ, लेकिन पूरी तरह मिट नहीं पाया।
पिछला एक दशक: बदली हुई ज़मीन, लेकिन बचा हुआ संदेह
बीते लगभग दस वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय बदलाव आया है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस की कड़ी निगरानी के चलते किसी भी प्रकार के असामाजिक नेटवर्क को पनपने का अवसर नहीं मिला। आज रांकई में कोई असाधारण सुरक्षा इनपुट नहीं है, कोई सक्रिय मामला नहीं है।
फिर भी सवाल यह है — क्या एक पुराने शक के आधार पर किसी गांव को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखना न्यायसंगत है?
सोशल मीडिया और सामूहिक सोच की समस्या
समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब सोशल मीडिया पर रांकई को लेकर की जाने वाली टिप्पणियां सामने आती हैं। कई बार बिना किसी तथ्य, बिना किसी वर्तमान संदर्भ के, पूरे गांव या समुदाय को एक ही तराजू में तौल दिया जाता है।
यह स्थिति केवल रांकई के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द के लिए भी चिंताजनक है।
ज़मीनी हकीकत क्या कहती है?
Stringer24 News की टीम द्वारा विगत लगभग तीन वर्षों से रांकई के विभिन्न मुद्दों को लगातार कवर किया जा रहा है — चाहे वह भ्रष्टाचार के मामले हों, सामाजिक विषय हों या स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रम। इस दौरान गांव की आंतरिक राजनीति, सामाजिक ताना-बाना और आम ग्रामीणों की सोच को समझने का प्रयास किया गया।
ज़मीनी स्तर पर अधिकांश ग्रामीण मिलनसार, सहयोगी और सामान्य ग्रामीण जीवन जीते हुए नज़र आते हैं। बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लगता है। लेकिन बातचीत के दौरान, आंखों में एक अदृश्य चिंता, एक अनकहा डर भी झलकता है।
डर का वह माहौल, जो दिखता नहीं
फिलहाल देश जिस सामाजिक और राजनीतिक दौर से गुजर रहा है, उसने एक अदृश्य भय का वातावरण निर्मित किया है। यह डर हर समय दिखाई नहीं देता, लेकिन वह समाज के भीतर कहीं न कहीं दरारें खींचने का काम जरूर करता है। संभव है कि रांकई भी इससे पूरी तरह अछूता न हो।
यह रिपोर्ट किसी भी ग्रामीण पर आरोप लगाने के लिए नहीं है। न ही किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा करने का उद्देश्य है। यह केवल मौजूदा परिस्थितियों का एक संवेदनशील आकलन है — एक प्रयास, यह समझने का कि इतिहास, डर और वर्तमान मिलकर किस तरह किसी गांव की पहचान को प्रभावित कर देते हैं।
निष्कर्ष नहीं, केवल सवाल…
क्या रांकई को अब उसके वर्तमान से आंका जाना चाहिए या हमेशा उसके अतीत से? यह सवाल केवल प्रशासन या मीडिया का नहीं, बल्कि समाज के हर जिम्मेदार नागरिक का है।
