दिव्यांग, बुजुर्ग और आम आदमी — किस गिनती में आते हैं साहब?
आज शहर के अष्टांग चिकित्सालय के पास गन्ने से भरी ट्राली और कार की जोरदार भिड़ंत हुई। वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं, लोग सवाल पूछ रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग…?
क्या शहर की सड़कों पर अब हादसा होना ही सामान्य बात हो गई है?
अस्पताल के सामने तेज रफ्तार ट्राली, कोई ट्रैफिक कंट्रोल नहीं, कोई चेतावनी नहीं — तो फिर जिम्मेदार कौन?
फुटपाथ नहीं, खुला बाजार — प्रशासन की मेहरबानी
फुटपाथों की हालत देखकर साफ लगता है कि, अवैध वसूली के चक्कर में नगर पालिका की छत्रछाया में ही सड़कों पर फुटपाथिया बाजार के अतिक्रमण को खुली छूट दे दी गई है। नगर पालिका ने हाथ खड़े कर दिए हैं।
सड़क पर दुकान, फुटपाथ पर दुकान, और पैदल चलने वाला? वह सीधे सड़क पर जान जोखिम में डालकर चले।
सुभाष पार्क चौराहा, बाहरी रोड, नगर पालिका, सरकारी अस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन — हर जगह फुटपाथ पर कब्जा, ठेले, तिरपाल, गुमटी, जैसे किसी ने खुली छूट दे दी हो।
फुटपाथ अगर दुकानदारों के लिए हैं तो जनता कहां चले साहब?
सबसे ज्यादा मार पड़ रही है बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग जनों पर। व्हीलचेयर? लाठी टेककर चलना? यह सब तो जैसे प्रशासन की योजना में ही नहीं है।
हर दिन सड़क पर उतरना, हर दिन हादसे का खतरा — यही है शहर की “स्मार्ट व्यवस्था”।
साहब के बंगले के पास नियम, जनता के लिए झोल
जरा मजेदार बात देखिए — कलेक्टर और एसपी साहब के बंगले के आसपास फुटपाथ एकदम साफ। ना ठेला, ना दुकान, ना अतिक्रमण।
लेकिन जैसे ही आम आदमी का इलाका आता है, वहीं नियम गायब, प्रशासन नदारद।
क्या कानून सिर्फ वीआईपी रास्तों तक ही जिंदा है?
क्या आम जनता का चलना, उनकी सुरक्षा, उनका जीवन — इतना सस्ता है?इस अतिक्रमण का सबसे ज्यादा खामियाजा बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांग जनों को भुगतना पड़ता है।
उन्हें मजबूरन सड़क पर चलना पड़ता है, जहां हर पल दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।
सवाल शहर के हैं, जवाब कब मिलेंगे?
या फिर अगला एक्सीडेंट होने के बाद फिर वही रटी-रटाई कार्रवाई दिखाई जाएगी?
