मांझी नेता अमर नौरिया एवं पूर्व विधायक सुनीता पटेल की मंशा पर उठते सवाल
बरमान कांड: घटना बीती, बवाल बाकी — आखिर किसे क्या चाहिए?
नरसिंहपुर जिले के बरमान में हुई घटना को एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन इसके बावजूद विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। सवाल यह नहीं कि घटना क्या थी, सवाल यह है कि अब भी बवाल क्यों जिंदा रखा जा रहा है?
क्या किसी को सच में न्याय चाहिए या फिर यह पूरा मामला सियासी स्वार्थ की भेंट चढ़ चुका है?
आईएएस अधिकारी का रवैया बना आक्रोश की वजह
कर्तव्य निर्वहन के दौरान एक आईएएस अधिकारी द्वारा अपनाया गया रवैया जिले भर में चर्चा और आक्रोश का कारण बना। सत्ता का रौब, पद की अकड़ और गरीब–कमजोर वर्ग के प्रति दिखाई गई सख्ती ने प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए।
हालांकि पंडित जी और मांझी समाज के युवक के बयान के बाद मामला ठंडा पड़ता दिखा, लेकिन ठीक उसी समय कांग्रेस और मांझी समाज के कुछ नेता अचानक आक्रामक हो उठे।
जब पीड़ित पक्ष शांत है, तो राजनीति को आखिर इतनी बेचैनी क्यों?
सोशल मीडिया पर उठते तीखे सवाल
सोशल मीडिया पर यूजर्स खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। एक यूजर ने टिप्पणी करते हुए लिखा —
“कांग्रेस का खुद का कोई काम अटका पड़ा है क्या, इसलिए इतना हल्ला मचाया जा रहा है?”
वहीं मांझी समाज के एक बड़े नेता को लेकर एक अन्य यूजर ने सीधे शब्दों में लिखा —
“ये कैसी गंदी राजनीति है?जो गंदगी फैला रहे,क्या यह उनका समर्थन है?समाज के नाम पर अपनी दुकान चमकाई जा रही है!”
पंचायत, गबन और रेत खनन पर चुप्पी क्यों?
जिला पंचायत सीईओ गजेंद्र नागेश को लेकर भी सोशल मीडिया पर सवालों की बाढ़ है। यूजर्स का कहना है कि —
“पंचायत में गबन और रेत खनन जैसे गंभीर मामलों पर चुप रहने वाला अधिकारी गरीब और कमजोरों पर अपनी पावर दिखा रहा है!”
सवाल साफ है — कार्रवाई चुनिंदा क्यों? क्या कानून और नैतिकता सबके लिए बराबर नहीं?
सफाई अभियान या पर्दे के पीछे कमाई?
अब तो बरमान का सफाई अभियान भी संदेह के घेरे में आ गया है। सोशल मीडिया पर यहां तक लिखा जा रहा है —
“बरमान मेले में जिसे कमाई नहीं हुई, वही लोग अब बवाल खड़ा कर रहे हैं!”
तो क्या सच में सफाई अभियान स्वच्छता के लिए था, या फिर यह पर्दे के पीछे कमाई अभियान बन चुका था?
क्या आस्था, समाज और प्रशासन — सब कुछ राजनीति और पैसों की भेंट चढ़ रहा है?
बरमान कांड अब एक घटना नहीं, बल्कि प्रशासन, राजनीति और समाज की नीयत का आईना बन चुका है।
सत्य और समाज के बीच की कड़ी
