बीते दो दिनों से बरमान को अखाड़ा बना दिया गया है। ऐसा अखाड़ा, जहां सच को उतरने ही नहीं दिया जा रहा। हर कोई अपने-अपने पूर्वाग्रहों की तलवार लेकर मैदान में खड़ा है।
यह अखाड़ा न नर्मदा का है, न धर्म का —
यह सत्ता, डर और बचाव की राजनीति का अखाड़ा है।
एक पंडित, एक मांझी, एक जिला पंचायत सीईओ और एक पुलिसकर्मी — वीडियो में दिखने वाले ये चार चेहरे इस घटनाक्रम के दृश्य पात्र हैं। लेकिन कहानी इससे कहीं बड़ी और कहीं ज्यादा असहज है।
असल में यह मामला अब घटना का नहीं, नैरेटिव का हो चुका है। मीडिया दो खेमों में बंटा दिख रहा है — एक खेमे में चुप्पी है, दूसरे में तथ्यों के साथ सवाल।
अब जनता खुद तय कर रही है कि निष्पक्ष कौन है और सुविधा का पक्षधर कौन।
इस पूरे मामले में सवाल सिर्फ एक था — क्या किसी प्रशासनिक अधिकारी को आम नागरिक के साथ इस तरह का आचरण करना चाहिए था?
क्या उस वक्त अधिकारी के पास कोई और विकल्प नहीं था?
क्या समझाइश, जुर्माना या चेतावनी संभव नहीं थी?
या फिर पद का अहंकार विवेक पर हावी हो गया?
यह कानून का नहीं, अहंकार का मामला है।
यदि जिला पंचायत सीईओ किसी आम नागरिक को थप्पड़ मारते हैं, तो यह केवल अनुशासनहीनता नहीं — गंभीर कदाचार और दंडनीय अपराध है।
यह कृत्य BNS की धारा 115 (पूर्व IPC 323) के अंतर्गत आता है, जिसमें कारावास और जुर्माना — दोनों का प्रावधान है।
लोक सेवक से गरिमामय व्यवहार की अपेक्षा होती है, न कि पद की वर्दी में शक्ति प्रदर्शन की।
लेकिन सवाल पूछने की जगह यहां बवाल खड़ा हो गया।
सोशल मीडिया पर बहस नहीं, वार चलने लगे। एक अधिकारी की गलती पर पर्दा डालने के लिए धमकियों, उग्र भाषा और चरित्र हनन का सहारा लिया गया।
यह लोकतंत्र की ही नहीं, नागरिक बोध की भी हत्या है।
यदि प्रशासन बुनियादी सुविधाएं नहीं दे सका — जैसे अस्थायी शौचालय की व्यवस्था — और किसी नागरिक से मानवीय भूल हो गई,
तो गलती को टारगेट बनाना और व्यवस्था की चूक को छिपा देना बेहद शर्मनाक है।
दीवारों पर कलाकृति और सोशल मीडिया पर चमकदार पोस्ट नर्मदा को नहीं बचा सकते।
सीईओ के समर्थन में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि वे अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि, क्या जिला पंचायत सीईओ ने बरमान में पंचायत स्तर पर मौजूद शौचालयों की मौजूदा स्थिति पर भी उतना ही ध्यान दिया था? क्या मेले और भीड़ को देखते हुए अस्थायी शौचालयों की पर्याप्त व्यवस्था समय रहते की गई थी?
और क्या जिस तल्लीनता और तत्परता से नर्मदा तट से पॉलीथिन उठाई जा रही है, उसी गंभीरता से ग्राम पंचायतों से लगातार उठ रही शिकायतों का भी निराकरण किया जा रहा है?
अच्छा काम सिर्फ दिखने से नहीं,
जमीनी व्यवस्था और जवाबदेही से साबित होता है।
इस मौके को राजनीति ने भी नहीं छोड़ा। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रशासन को सवालों के घेरे में खड़ा किया, और पूरा क्षेत्र आरोप–प्रत्यारोप का मंच बन गया।
एक पल के लिए यह भी साफ नहीं था कि यह सीईओ और बरमान का विवाद है — या मीडिया की आपसी खींचतान।
जब प्रशासन गलती ढकने लगे,
और मीडिया सवाल छोड़कर पक्ष चुन ले —
तब लोकतंत्र मरता नहीं,
उसे भीड़ के सामने पीटा जाता है।
अगले अंक में यह भी पूछा जाएगा —
क्या चुप रहने वाला मीडिया भी इस थप्पड़ का साझेदार है?
