यह सफाई नहीं… यह आस्था की सेवा है
जब पूरा शहर अभी नींद की आगोश में होता है, जब सूरज की पहली किरणें नर्मदा के जल से आंख-मिचौली खेल रही होती हैं, उसी वक्त धार्मिक नगरी बरमान के घाटों पर कुछ युवा चुपचाप उतर आते हैं।
न कोई बैनर, न कोई नारा, न कोई कैमरा — बस हाथों में झाड़ू, मन में श्रद्धा और हृदय में यह भाव कि यह घाट हमारे हैं, इन्हें स्वच्छ रखना हमारा धर्म है।
आज की पीढ़ी से अक्सर सवाल किए जाते हैं, लेकिन बरमान के ये युवा जवाब बनकर खड़े हैं।
बीते तीन से चार सप्ताह से युवाओं की यह टोली हर सुबह बरमान पहुँच जाती है। कोई घाट की सीढ़ियों से प्लास्टिक बटोरता है, कोई पूजा के बाद छोड़े गए अवशेष समेटता है, तो कोई नर्मदा तट को फिर से सांस लेने लायक बना देता है।
यह दृश्य सिर्फ आंखों को नहीं, अंतरात्मा को भी सुकून देता है।
इस पहल की सबसे सुंदर बात यह है कि यह अकेली नहीं है। जैसे ही लोग देखते हैं कि युवा श्रम कर रहे हैं, वैसे ही स्थानीय नागरिक भी जुड़ने लगते हैं। कोई झाड़ू थाम लेता है, कोई कचरा उठाने में हाथ बंटाता है, तो कोई बस यह कह देता है — “बेटा, अच्छा काम कर रहे हो।”
जब समाज साथ चलता है, तब बदलाव मजबूरी नहीं, संस्कार बन जाता है।
बरमान आने वाले श्रद्धालु भी इस दृश्य से अछूते नहीं रहते। जो लोग दूर-दराज से दर्शन के लिए आते हैं, वे भी कुछ पल रुककर सहयोग करते हैं। कोई अपने हाथ से कचरा उठाता है, कोई बच्चों को समझाता है कि घाट गंदा करना पाप से कम नहीं।
यह केवल साफ-सफाई का काम नहीं, यह पीढ़ियों को दिया जा रहा संस्कार है — कि आस्था केवल दीप जलाने से नहीं, बल्कि परिवेश बचाने से भी प्रकट होती है।
नर्मदा के ये घाट केवल पत्थर की सीढ़ियाँ नहीं हैं, यह हजारों वर्षों की श्रद्धा, साधना और संस्कृति का आधार हैं। और जब इन्हें स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी युवा कंधों पर आती है, तो भविष्य अपने-आप उजला दिखाई देने लगता है।
अगर युवा चाह लें,
तो धर्मस्थल केवल पूजा के नहीं,
प्रेरणा के केंद्र भी बन सकते हैं।
बरमान के ये युवा न तो किसी प्रशंसा की अपेक्षा करते हैं, न किसी सम्मान की। लेकिन समाज की जिम्मेदारी है कि ऐसी सोच को सलाम करे, और इसे आगे बढ़ाए।
