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यह कौन-सा भारत है?

जहाँ डर घरों में रहता है और नफ़रत सड़कों पर!

एक माँ रात को सोने से पहले अपने बेटे से कहती है — “बाहर ज़्यादा मत रुकना, बहस मत करना, और नाम पूछें तो सोच-समझकर जवाब देना…”

यह किसी सीमा क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह आज के भारत का सच है।

“आज डर यह नहीं कि क्या होगा, डर यह है कि कौन देख रहा है।”

क्या यही वह आज़ादी है जिसके लिए पीढ़ियों ने कुर्बानी दी थी?

सवाल पूछना अब हिम्मत का काम है

गाँव हो या शहर, चाय की दुकान हो या कॉलेज का कैंपस — लोग धीरे बोलते हैं।

हर बात के बाद एक वाक्य ज़रूर जुड़ता है — “भाई, ज़्यादा बोलना ठीक नहीं है।”

क्या लोकतंत्र में चुप्पी ज़रूरी शर्त बन चुकी है?

धर्म अब आस्था नहीं, पहचान पत्र बन गया है

आज किसी की जाति, नाम या पहनावे से उसका अपराध तय किया जा रहा है।

कहीं शक के नाम पर पीटा जा रहा है, कहीं प्रेम के नाम पर मार दिया जाता है, और कहीं सिर्फ इसलिए कि वह “दूसरा” है।

“मौत से पहले सवाल नहीं पूछे जाते, नाम पूछा जाता है।”

भीड़ को अब कानून का डर नहीं, बल्कि संरक्षण का भरोसा है।

सनातन के नाम पर जो हो रहा है, क्या वही सनातन है?

सनातन ने कभी सह-अस्तित्व सिखाया था, विरोध के साथ जीना सिखाया था।

लेकिन आज उसी शब्द की आड़ में गालियाँ भी जायज़ हैं, धमकियाँ भी, और हत्याएँ भी।

अगर करुणा गुनाह है और हिंसा गर्व — तो फिर यह धर्म नहीं, सत्ता की भाषा है।

यह बदले का भारत नहीं होना चाहिए

इतिहास की गलतियों का बोझ आज के मासूम कंधों पर क्यों?

जो आज ताली बजा रहा है, कल वही भीड़ उसका नाम भी पूछ सकती है।

“नफ़रत कभी वफादार नहीं होती, वह अंत में अपने ही घर लौटती है।”

सवाल यह नहीं कि भारत किससे बदला ले रहा है, सवाल यह है — क्या भारत खुद से दूर होता जा रहा है?

यह रिपोर्ट किसी दल के खिलाफ नहीं है, यह उस डर के खिलाफ है जो हमारे भीतर घर कर चुका है।

अगर आज भी हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ सवाल नहीं पूछेंगी — वे बस डरना सीखेंगी।

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