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*“चिचली सीईओ को मोहपानी गबन गैंग ने पहले ही खरीद लिया है"*

मोहपानी तालाब मामले में नरसिंहपुर जिला एक नया रिकॉर्ड बनाने जा रहा है।पंचायत को लूटने वाली मोहपानी गबन गैंग के लुटेरों के हौसले की दाद देनी पड़ेगी,इनमें न शर्म बाकी है और न ही कानून के प्रति कोई खौफ और न इंसानियत!

खुलेआम प्रशासन को चुनौती दे रही है मोहपानी की गबन गैंग और प्रशासन में बैठे लोग सिर्फ गुलाबी पत्ती गिनने में मगन दिखाई दे रहे हैं!

जिला पंचायत अधिकारी द्वारा जनपद पंचायत अधिकारी को मामले पर संज्ञान लेने के लिए कहा जाता है,लेकिन इसके बावजूद चिचली सीईओ के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही,जाहिर सी बात है,एक थाली में गबन की खिचड़ी खाई है तो नमक का हक तो अदा करना पड़ेगा!

खुद को ईमानदार बताने वाले चिचली जनपद सीईओ की चुप्पी अब संदेह नहीं, सीधा-सीधा संरक्षण लगने लगी है। मोहपानी तालाब के नाम पर हुआ लाखों का खेल सिर्फ गबन नहीं—यह प्रशासनिक ढांचे में बैठी सड़ी हुई मानसिकता का सबसे बड़ा नमूना है।

जब एक जिला पंचायत अधिकारी किसी प्रकरण पर तत्काल कार्रवाई के लिए लिखित निर्देश देता है, तो जनपद का सीईओ उस पर सन्नाटा ओढ़कर बैठ जाए—यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि कमीशनखोरी की परंपरा का जीवंत प्रमाण है।

गांव के गरीब आदिवासी मजदूरों की जेब से निकली मनरेगा मज़दूरी को लूटने वाले ये गबनबाज तो अपनी औक़ात दिखा चुके हैं—

पर असली सवाल तो उन अफ़सरों पर है, जो कुर्सी पर बैठकर जनता के पैसे पर डाका डालने वालों को ढाल बनकर बचा रहे हैं।

मोहपानी की गबन गैंग को जो प्रशासनिक सुरक्षा मिली हुई है, वह ऐसी ही नहीं आती—

फाइलें दबाने का रेट तय है…

रिपोर्ट आगे न बढ़ाने का रेट अलग…

जन सुनवाई में शिकायत न चढ़ने का रेट और…

पीछे से ‘सब मैनेज है’ बोलने का रेट सबसे भारी!

और यही वजह है कि सीईओ चिचली को न कानून दिख रहा है, न आदेश, न ही जिला स्तर पर हुई बैठकों का महत्व—

क्योंकि जब पेट में कमीशन की रोटी जाए, तो कानों तक जनता की चीखें भी नहीं पहुंचतीं!

अब तो दबी जुबान में गांव में यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि

“चिचली सीईओ को मोहपानी गबन गैंग ने पहले ही खरीद लिया है…!

इसलिए फाइलें दबाना, शिकायतें गायब कर देना और गुनाह को ढक देना उनका नया विभागीय धर्म बन गया है।”

लेकिन सवाल यहां खत्म नहीं होता—

क्या जिला प्रशासन भी इस पूरे खेल को आंख मूंदकर देख रहा है?

क्या अधिकारी सिर्फ कागज़ पर नोटिंग करके जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं?

या फिर पावर के पीछे कोई ऐसा अदृश्य हाथ है, जो सही जांच को होने ही नहीं दे रहा?

कुछ तो है…

जो गबनखोरों को इतना साहस दे रहा है कि वो प्रशासन को खुलेआम चुनौती दे रहे हैं—

और प्रशासन के लोग, चुपचाप चुनौती स्वीकार कर रहे हैं!


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