मोहपानी तालाब पर हुए गबन की इस काली कहानी में सचिव सत्यनारायण कौरव सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि पूरे गांव की उम्मीदों को चाट जाने वाला वो चेहरा है, जिसने आदिवासी समाज की मेहनत, उनका हक—सब कुछ अपने आराम की थाली में परोस लिया।
गांव वाले तालाब का सपना देख रहे थे…
लेकिन गबन गैंग के पेट में तो जैसे पूरा मोहपानी गांव समा गया!
जिन गरीब मेहनतकश आदिवासियों की मजदूरी से घर में चूल्हा जलता है, उनके नाम पर कागजों में मज़दूरों की लंबी लिस्ट तो भर दी गई… पर असल में? पैसा अपात्रों के खातों में ट्रांसफर—और झट से कैश आउट!
“मजदूरी गरीब की, मज़ा किसी और का!”
गांव वालों के हिस्से की खुशियां, उनके हक, उनके आँसू…
सबको गबन गैंग ने ऐसे लूटा जैसे यह गांव नहीं उनकी बापौती हो!
सत्यनारायण कौरव—गांव की साख बेचकर बचा क्या लिया?
जनता पूछ रही है—
तालाब लूटकर तुमने किसका भला किया?
आखिर कौन-सा ऐसा लालच था कि अपने ही गांव की मिट्टी को धोखा दे दिया?
जिनके खातों में फर्जी मजदूरी गई—they are the ones सबसे ज्यादा बेचैन!
गबन का माल खाया है तो अब थोड़ी वफ़ा भी निभानी पड़ेगी भाई!
अब गांव पूछ रहा है—कब होगी नैतिक गिरफ्तारी?
मोहपानी के लोग अब खामोश नहीं हैं।
गांव की हर बैठक, हर चौपाल में एक ही बात—
गबन गैंग का पर्दाफाश होगा, और पूरा होगा!
