आनंद उत्सव या स्वार्थ उत्सव?
बरहटा पंचायत में सरकारी आयोजन पर उठते गंभीर सवाल
आनंद उत्सव का उद्देश्य नागरिकों में खुशी, सहभागिता और सौहार्द बढ़ाना है, लेकिन बरहटा ग्राम पंचायत में यही उत्सव अब सवालों के घेरे में आ गया है।
आनंद उत्सव: भावना कुछ और, तस्वीर कुछ और
आनंद उत्सव *प्रतिस्पर्धा नहीं, सहभागिता* की भावना के साथ मनाया जाने वाला सरकारी आयोजन है, जिसमें पारंपरिक खेल, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और सभी वर्गों—महिला, बुजुर्ग व दिव्यांगजन—की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। लेकिन बरहटा में यह भावना कागज़ों तक ही सीमित नजर आती है।
सरपंच पति पर गंभीर आरोप
आरोप है कि **बरहटा सरपंच पति ने आनंद उत्सव को भी स्वार्थ की रोटी सेकने का जरिया बना लिया**। ग्रामीणों का कहना है कि आयोजन जिस उद्देश्य से किया जाना चाहिए, वह ज़मीन पर दिखाई नहीं देता, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में खर्च का आंकड़ा चौंकाने वाला है।
कागज़ों में बड़े स्तर पर खेल प्रतियोगिताएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और व्यापक सहभागिता दिखाई जा रही, लेकिन वास्तविकता में न तो वैसी चहल-पहल और न ही दिव्यागजनों की सक्रिय मौजूदगी दिखाई देती है!
खर्च का हिसाब, हकीकत से बाहर?
जिस तरह से **सरकारी राशि का उपयोग दर्शाया गया है**, उसे देखकर यह कहना मुश्किल हो जाता है कि यह आयोजन ग्रामीणों के आनंद के लिए है! कई मदों में ऐसा खर्च बताया गया है, जो ज़मीनी स्तर पर हुए सीमित कार्यक्रमों से मेल नहीं खाता।
सवाल यह नहीं कि आनंद उत्सव क्यों मनाया गया/जा रहा है?, सवाल यह है कि क्या इसके नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग किया जाना सही है?
ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि **आनंद उत्सव जनता के चेहरे पर मुस्कान लाने के बजाय कुछ खास लोगों की जेब भरने का माध्यम बन गया**। यदि आयोजन वास्तव में हुआ भी, तो वह औपचारिकता भर, जबकि भुगतान और बिलिंग पूरी तरह भव्य दिखाई गई।
कार्रवाई कब?
अब जरूरत है कि जिम्मेदार विभाग इस पूरे मामले की **निष्पक्ष जांच** कराए। क्योंकि अगर आनंद उत्सव जैसे सकारात्मक आयोजन भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ेंगे, तो सरकारी योजनाओं पर जनता का भरोसा कैसे बचेगा?
