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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

उन्नाव मामला: जब न्याय जिंदा रहा, पर भरोसा मर गया

विशेष रिपोर्ट | दिसंबर 2025

एक लड़की थी… जिसने हिम्मत की। सच बोला। लड़ी। और फिर आज वही लड़की डर रही है।

उन्नाव बलात्कार मामला कभी सिर्फ एक अपराध नहीं था। यह उस हिम्मत का नाम था, जो सत्ता, दबाव और खौफ के सामने खड़ी हुई। यह उस भरोसे की कहानी थी, जो एक नाबालिग लड़की ने न्याय व्यवस्था पर किया।

लेकिन 23 दिसंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट के एक फैसले ने उस भरोसे को गहरे ज़ख्म दे दिए।

23 दिसंबर 2025: एक तारीख, जो डर बन गई

दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्नाव मामले के दोषी, पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सज़ा को निलंबित करते हुए उसे जमानत दे दी।

अदालत का तर्क था — सेंगर सात साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है, और उसकी अपील लंबित है।

कागज़ों पर यह आदेश कानूनी हो सकता है, लेकिन ज़मीन पर इसका मतलब एक डरी हुई पीड़िता और फिर से लौटता हुआ खौफ है।

शर्तें… लेकिन क्या डर भी शर्तों में बंधता है?

  • पीड़िता के घर से 5 किलोमीटर दूर रहने की शर्त
  • पासपोर्ट जमा करने का आदेश

अदालत ने शर्तें लगा दीं। लेकिन सवाल यह है — क्या डर भी पाँच किलोमीटर दूर रहता है?

“हमारे लिए यह जमानत नहीं है… यह मौत का साया है।” — पीड़िता

पीड़िता का डर: जो शब्दों से बड़ा है

पीड़िता और उसका परिवार कहता है — उन्होंने पहले भी बहुत कुछ खोया है। पिता को खोया। सुरक्षा को खोया। बचपन को खोया।

अब जब दोषी बाहर है, तो उन्हें हर कदम पर फिर वही डर महसूस हो रहा है।

“अगर इतने ताकतवर आदमी को रिहा किया जा सकता है, तो हमें कौन बचाएगा?” — यह सवाल सिर्फ एक लड़की का नहीं, हर उस पीड़िता का है, जो आज भी चुप है।

इंडिया गेट पर एक मां की चीख

फैसले के विरोध में पीड़िता और उसकी मां दिल्ली के इंडिया गेट पहुँचीं। हाथ में कोई हथियार नहीं था। बस डर था। और इंसाफ की गुहार।

कुछ देर बाद पुलिस आई। और उन्हें वहां से हटा दिया गया।

कभी-कभी कानून की चुप्पी किसी मां की चीख से भी ज़्यादा डरावनी होती है।

उन्नाव: सिर्फ एक केस नहीं

  • 2017: नाबालिग लड़की ने बलात्कार का आरोप लगाया।
  • 2018: पिता की हिरासत में मौत।
  • 2019: “मरते दम तक” उम्रकैद।
  • 2020: पिता की हत्या में 10 साल की सज़ा।

यह घटनाएँ सिर्फ तारीखें नहीं हैं। ये उस कीमत की कहानी हैं, जो सच बोलने पर चुकानी पड़ती है।

न्याय ज़िंदा है… पर भरोसा?

बिलकिस बानो से लेकर उन्नाव तक, एक सवाल बार-बार सामने आता है —

क्या न्याय सिर्फ फैसलों का नाम है, या पीड़िता का चैन भी उसका हिस्सा होना चाहिए?

आज उन्नाव की पीड़िता डरी हुई है। और जब एक पीड़िता डरती है, तो समाज हारता है।

यह रिपोर्ट किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि उस टूटते भरोसे की गवाही है, जिसे जोड़ना अब सबसे ज़रूरी है।

© Stringer24 News
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