गुड़ भट्ठियों की आग में झुलसती महिलाएं?
जहाँ गुड़ पकता है… वहाँ कई औरतों की चुप्पी भी पकाई जाती है
सुबह की ठंडी हवा में जब भट्ठी की आग सुलगती है, तो उसके चारों ओर कुछ औरतें खामोशी से खड़ी होती हैं। उनके हाथों में औज़ार हैं, और आँखों में — डर।
वे जानती हैं… आज भी काम मिलेगा, पर इज्ज़त की कोई गारंटी नहीं।
काम की जगह, डर की दुनिया
गुड़ भट्ठियों पर काम करने वाली महिला मजदूर किसी सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं होतीं। वे बस मौजूद होती हैं — इस्तेमाल के लिए।
उनसे कहा जाता है — “काम चाहिए तो ज़्यादा सवाल मत पूछो।” और सवालों में सबसे बड़ा सवाल होता है — उनकी देह।
“हम गरीब हैं साहब… पर क्या इसका मतलब यह है कि हम औरत नहीं हैं?”
दैहिक शोषण: जो कहा नहीं जाता
शाम ढलते ही माहौल बदल जाता है। अकेले बुलाना, देर तक रोकना, छूने की कोशिश, अश्लील निगाहें — यह सब यहाँ घटना नहीं, व्यवस्था है।
जो औरत मना करती है, उसका नाम अगली सुबह की सूची से हटा दिया जाता है।
और जो चुप रहती है — वह हर रात खुद से लड़ती है।
इन भट्ठियों में गुड़ से पहले औरतों की सहनशक्ति पिघलाई जाती है।
शिकायत की कीमत
“पुलिस में जाओ” — यह सलाह देना आसान है।
लेकिन उस औरत के लिए पुलिस जाना मतलब — काम का खत्म होना, गाँव में फुसफुसाहट, बच्चों के भविष्य पर सवाल और पति या परिवार की चुप हिंसा।
इसलिए वह रोती नहीं, चिल्लाती नहीं, बस और ज़्यादा चुप हो जाती है।
जब पेट की आग इज्ज़त से बड़ी हो जाए, तो इंसान नहीं — मजबूरी जीतती है।
प्रशासन की संवेदनहीनता
श्रम विभाग कहता है — “कोई शिकायत नहीं आई।” पंचायत कहती है — “यह निजी मामला है।”
पर कोई यह नहीं पूछता कि शिकायत करने लायक सुरक्षा कभी दी भी गई थी?
एक समाज से सवाल
जब आप चाय में गुड़ घोलते हैं, तो एक पल रुककर सोचिए —
क्या उस मिठास में किसी औरत की चुप चीख़ मिली हुई है?
अगर हाँ… तो यह सिर्फ शोषण नहीं, हम सबकी साझी जिम्मेदारी है।
