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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

ग्राम पंचायत — कार्यालय एवं अन्य व्यय: सालाना खर्च और हेरफेर

विशेष रिपोर्ट —

ग्राम पंचायत का सालाना खर्च राज्य, जनसंख्या और योजनाओं पर निर्भर करता है, लेकिन एक सामान्य औसत ढांचा पूरे देश में लगभग समान रहता है। हालांकि — “कितना हेरफेर होता है” इसका कोई आधिकारिक अंक नहीं होता, अलग अलग ग्राम पंचायतों में गबन के आंकड़े भिन्न होते हैं,पर जमीनी अनुभव और ऑडिट रिपोर्टें एक पैटर्न ज़रूर बताती हैं।

✅ ग्राम पंचायत एक वर्ष में कार्यालय एवं अन्य व्यय पर कितना खर्च करती है?

जिले में एक साधारण ग्राम पंचायत का अनुमानित वार्षिक बजट:

1️⃣ पंचायत कार्यालय संचालन (Office Expenditure)

इसके अंतर्गत खर्च होता है:
- स्टेशनरी
- कंप्यूटर/प्रिंटर इंक
- कार्यालय रखरखाव
- बिजली बिल
- सफाई
- छोटे-मोटे मरम्मत

👉 औसत खर्च: ₹1,50,000 से ₹3,00,000 प्रति वर्ष

2️⃣ प्रशासनिक व्यय (Administrative Expenses)

- सचिव/कर्मचारी यात्रा खर्च
- मीटिंग आयोजन
- ग्राम सभा/कार्य समिति बैठक
- फोटोकॉपी, प्रिंटिंग
- इंटरनेट/मोबाइल, डाक खर्च

👉 औसत खर्च: ₹1,00,000 से ₹2,50,000 प्रति वर्ष

3️⃣ अन्य व्यय (Miscellaneous)

- कार्यक्रम आयोजन
- पंचायत भवन की मरम्मत
- छोटे निर्माण कार्य
- निरीक्षण/दस्तावेज़ संकलन
- पंचायत स्तर के छोटे खरीद

👉 औसत खर्च: ₹1,00,000 से ₹2,00,000 प्रति वर्ष

कुल औसत वार्षिक कार्यालय/अन्य खर्च
> ₹3,50,000 से ₹7,50,000 प्रति वर्ष
(बहुत बड़ी पंचायतों में यह ₹10–15 लाख तक भी पहुँच सकता है)

❗ अब असली सवाल: इसमें कितना हेरफेर होता है?

यह आंकड़े आधिकारिक तौर पर कहीं दर्ज नहीं होते, लेकिन जनपद, जिला ऑडिट और सीएजी की रिपोर्टों से एक ट्रेंड सामने आता है:

🔴 सामान्यत: 20% से 40% तक की अनियमितताएँ
इन तरीकों से होती हैं:
- फर्जी बिल
- बाजार मूल्य से 2 गुना रेट
- बिना कार्य के भुगतान
- स्टेशनरी/कंटीजेंसी में सबसे ज्यादा हेरफेर
- यात्रा भत्ता फर्जी
- सफाई/मरम्मत के फर्जी रसीद
- मीटिंग/ग्राम सभा दिखाकर खर्च

🔴 कई पंचायतों में हेरफेर 50–60% तक भी देखा गया है
जैसे:
- ₹2,40,000 के स्टेशनरी बिल
- ₹1,20,000 की फर्जी टेंट/लाइट आपूर्ति
- ₹80,000—₹1,00,000 मीटिंग/टी प्रदाय पर
- मरम्मत के नाम पर “कागजों में ही काम”

📌 निष्कर्ष:
ग्राम पंचायतें हर साल 3–7 लाख सिर्फ कार्यालय और अन्य व्यय में खर्च करती हैं।
लेकिन इन मदों में 20% से 40% तक का पैसा अक्सर कागजों में ही उड़ जाता है।
और यदि पंचायत कमजोर निगरानी में हो—तो ये हेरफेर आधा बजट तक पहुँच जाता है।
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