STRINGER24NEWS | संपादकीय
गरीबी का गंदा मज़ाक!
मेरी आंखों के सामने ट्रेन में करतब दिखाती बिटिया!
क्या यही है 2025 का भारत?
दोपहर का सफर था।सचखंड ट्रेन में भीड़ थी।
मैं अपनी सीट पर बैठा था कि तभी एक छोटी सी बच्ची—
उम्र मुश्किल से 8-9 साल…
नंगे पैर… धूल से भरा चेहरा…
हाथों में पतली सी लकड़ी…
और आँखों में एक मजबूर सी चमक…
वो मेरे सामने *करतब दिखाने लगी*।
हर छलांग में उसका बचपन टूट रहा था,
हर ताली से पहले उसका आत्मसम्मान रो रहा था।
और हम, सभ्य समाज… बस देखते रहे।
*देश कहता है — हम विकसित हो रहे हैं। मैं कहता हूँ — गरीबों का विकास सिर्फ भाषणों में होता है।*
उसने खेल दिखाकर चुपचाप हाथ आगे किया —
**“कुछ दे दीजिए साहब…”**
उस छोटी हथेली में सिक्के गिरते गए,
और मेरी रूह पर सवालों की चोट!
सरकारों के आँकड़े, योजनाओं की फाइलें, ग्लोबल मंचों पर वाहवाही के बुलबुले… और इसी देश के डिब्बों में *बच्चों का भविष्य भिक्षा मांग रहा है।*
सरकारों के आँकड़े, योजनाओं की फाइलें, ग्लोबल मंचों पर वाहवाही के बुलबुले… और इसी देश के डिब्बों में *बच्चों का भविष्य भिक्षा मांग रहा है।*
*जिस देश में बच्चों को शिक्षा की जगह करतब करना पड़े, वहाँ विकास नहीं… ढोंग बढ़ रहा है।*
उससे नजरें चुराकर मैं आगे नहीं बढ़ सकता।
क्योंकि जो मैंने देखा…
उसे भूल पाना संभव नहीं।
भारत विश्वगुरु बनने का सपना देख रहा है। ग्लोबल समिट में देश की विकास नीतियों की वाहवाही हो रही है। अरबों-खरबों के प्रोजेक्ट गिनाए जा रहे हैं। लेकिन उसी भारत की एक छोटी सी बच्ची — आधा पेट, नंगे पाव, डर और मजबूरी के बीच — रेल की पटरियों पर नहीं… चलती ट्रेन में **करतब दिखाकर दो वक्त की रोटी जुटा रही है।**
ये दृश्य कोई फिल्म नहीं… यह सच्चाई है हमारे बदलते भारत की। जहां सपनों के शहरों की चमक के पीछे छिपा है कर्ज, भूख, और दो जून की तलाश।
*सरकारें कहती हैं — विकास हो रहा है। हकीकत कहती है — बच्चों का बचपन बिक रहा है।*
यह सवाल सिर्फ एक बच्ची का नहीं। यह सवाल है हमारी व्यवस्था का, हमारे समाज का, हमारी चुप्पी का। ट्रेन में ताली बजाकर मुस्कान के लिए सिक्के उछाल देने भर से **गरीबी दूर नहीं होने वाली।**
क्या यही है वह अमृतकाल, जिसका दावा किया जा रहा है? जहां शिक्षा के अधिकार की जगह मजबूरी का तमाशा बिकता है?
आज भारत सुपरपावर बनना चाहता है। लेकिन जब तक गरीबी बच्चों के भविष्य को निगलती रहेगी… **इस महाशक्ति का दिल कभी शक्तिशाली नहीं बन पाएगा।**
*बदलाव सिर्फ तब आएगा, जब हम मज़बूर बच्चों को “दया” से नहीं, “अधिकार” से देखेंगे।*
आज मैं यह सवाल लिख रहा हूँ— **कब तक बच्चों के सपने डिब्बों में धक्के खाते रहेंगे?** कब तक गरीबी का यह गंदा मज़ाक चलता रहेगा?
— विक्रम सिंह राजपूत
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