चांडालों को देवता बनाता मीडिया?
एक खूंखार नक्सली को “मासूम युवती” बताकर क्या छुपाना चाहता है तंत्र?
देश में बंदूक उठाने वालों को “भटकी हुई युवती” बताकर मासूमियत का चोला पहनाने का नया फैशन चल पड़ा है। ताज़ा मामला है छत्तीसगढ़ की 22 वर्षीय महिला नक्सली सुनीता आयम (ओयाम) का, जिसने हाल ही में मध्य प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया है।
यह वही सुनीता है, जिस पर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ — तीनों राज्यों में मिलाकर ₹14 लाख का इनाम था।मौजूदा जानकारी के मुताबिक वह माओवादी सेंट्रल कमेटी के सदस्य रामदेर की सशस्त्र गार्ड रही है, और मलाजखंड-दर्रेकसा दलम की सक्रिय सदस्य थी — यानी वो नक्सल मोर्चे की वो कड़ी थी, जिसके आदेश पर जंगलों में गोलियां चलीं, और हमारे कई जवानों ने शहादत दी।
लेकिन अब वही सुनीता ‘बेचारी युवती’ बन गई है, जिसे मीडिया “गुमराह हुई लड़की” बताकर सॉफ्ट स्टोरी में बदल रहा है।
कहानी बदली या नैरेटिव?
सुनीता ने बताया कि उसे संगठन में “बदनाम” किया जा रहा था, इसलिए उसने हथियार डालने का फैसला किया। सवाल यह है — क्या यही संवेदना उन परिवारों के लिए भी दिखाई गई, जिनके बेटे नक्सल हमलों में मारे गए?
आज उसे आत्मसमर्पण नीति के तहत ₹39 लाख, आवास और नौकरी सहायता मिलेगी। यानी जिन्होंने बंदूक उठाई, उन्हें पुरस्कार — और जो बंदूक के सामने खड़े हुए, उन्हें सिर्फ तिरंगा!
33 साल बाद मध्य प्रदेश में पहला सशस्त्र नक्सली आत्मसमर्पण
मध्य प्रदेश में पिछले 33 वर्षों में किसी सशस्त्र नक्सली का यह पहला आत्मसमर्पण है। पुलिस इसे सफलता बता रही है, जबकि ज़मीनी सवाल यह है — क्या हम धीरे-धीरे अपराध को ही प्रेरणा बना रहे हैं?
देश को सोचना होगा — कहीं हम उन हाथों को ही सहला तो नहीं रहे, जिन्होंने वर्दीधारी बेटों की जान ली थी?
सुनीता का आत्मसमर्पण एक प्रशासनिक उपलब्धि ज़रूर है, लेकिन उसका महिमामंडन मीडिया के लिए कलंक है। अपराध को “संवेदना” में बदलना पत्रकारिता नहीं — जनभावना के साथ विश्वासघात है।
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