सालीचौका–गाडरवारा अंचल में किसान संगठनों की गतिविधियां एक बार फिर चर्चा में हैं। लंबे समय से माकपा किसान नेता जगदीश पटेल ने क्षेत्र में संगठन को मजबूत आधार दिया, लेकिन विगत तीन वर्षों से वे पारिवारिक कारणों के चलते सक्रिय राजनीति से दूर हैं। उनकी धर्मपत्नी गंभीर कैंसर से जूझ रही हैं, और इस कठिन दौर में पटेलजी स्वयं भी कई स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
ऐसे समय में किसान राजनीति के इस मंच पर एक नया और ऊर्जावान चेहरा सामने आया है — देवेन्द्र वर्मा। वर्तमान में वे किसान सभा के महासचिव पद पर सक्रिय हैं, और उन्होंने अल्प समय में ही क्षेत्रीय किसान राजनीति को नई दिशा देने का बीड़ा उठाया है। बीते कुछ महीनों में वर्मा ने सालीचौका, गाडरवारा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में किसानों से सीधे संवाद कर उनकी समस्याएं सुनी हैं।
“किसान की समस्या किताबों में नहीं, खेत की मिट्टी में मिलती है” — देवेंद्र वर्मा का यह कथन आज उनके व्यक्तित्व की पहचान बन चुका है। वे गांव-गांव जाकर किसानों के बीच बैठते हैं, खेतों की मेड़ों पर बैठकें करते हैं और समस्याओं को सीधे अधिकारियों तक पहुंचाने का साहस दिखाते हैं।
देवेंद्र वर्मा के नेतृत्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे भाषणों में नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत में विश्वास रखते हैं। धूप, धूल और दूरी — इन तीनों से बेपरवाह होकर वे गांवों में घूमते हुए किसानों से जुड़े मुद्दे जैसे फसल बीमा, सिंचाई व्यवस्था, समर्थन मूल्य और बिजली बिल सुधार पर लगातार आवाज उठा रहे हैं।
उनके समर्थकों का कहना है कि वर्मा की राजनीति में “शब्दों की शांति” नहीं, बल्कि “संघर्ष की सच्चाई” दिखाई देती है। वे किसानों के हक़ के लिए प्रशासन से सीधे टकराने से भी नहीं हिचकते। कई बार उन्होंने क्षेत्रीय अधिकारियों के सामने धरना और ज्ञापन प्रदर्शन के ज़रिए किसानों की समस्याएं मजबूती से रखी हैं।
देवेंद्र वर्मा कहते हैं — “किसान को कोई एहसान नहीं, उसका हक़ चाहिए। सरकारें भूल जाती हैं, लेकिन खेत की मिट्टी सब याद रखती है।”
सालीचौका–गाडरवारा क्षेत्र में युवाओं और किसान वर्ग में देवेंद्र वर्मा की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले समय में वे किसान राजनीति के एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभर सकते हैं। संगठन के भीतर उनका प्रभाव तेजी से बढ़ा है और कई पुराने कार्यकर्ता अब उन्हें नई पीढ़ी का प्रतिनिधि मान रहे हैं।
