भोजन और संक्षिप्त विश्राम के बाद हमने आगे का सफर बढ़ाया। रात के लगभग 9 बजे परिक्रमा दल ने अंधेरे और दुर्गम मार्गों पर अपने कदम बढ़ाए। कहीं पगडंडी, कहीं ऊबड़-खाबड़ मिट्टी के रास्ते — लेकिन हर कदम पर दीपों की लौ और भक्ति का उजास साथ था।
चारों ओर सन्नाटा था, बस कंकड़ों पर चलती थकी पर आस्था से भरी पदचाप, और हवा में गूंजते हरि-नाम के स्वर। हर किसी के मन में बस एक ही कामना थी — “कार्तिक पूर्णिमा की पावन प्रभात बेला में माँ सरस्वती के घाट पर पवित्र स्नान और पूजन का सौभाग्य मिले।”
घंटों की कठिन रात्रि यात्रा के बाद, जब भोर की ठंडी हवा ने चेहरे को छुआ — तो लगा जैसे स्वयं प्रकृति ने स्वागत किया हो। सुबह लगभग 3:30 बजे हम सरस्वती घाट पहुँचे।
और दृश्य… सच में अवर्णनीय था। घाट पर दीपों की कतारें लहरों पर तैर रही थीं, जैसे आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों। शीतल हवा में अगरबत्ती और पुष्पों की सुगंध घुली थी। सैकड़ों श्रद्धालु — कोई जल में डुबकी लगाता, कोई आरती की थाली सजाता, तो कोई हाथ जोड़कर मौन ध्यान में लीन था। हर चेहरे पर भक्ति की रोशनी थी, हर आँख में शांति का झिलमिल प्रकाश।
“कार्तिक पूर्णिमा की इस पावन भोर पर, सरस्वती घाट स्वयं स्वर्ग का स्वरूप बन गया था।”
🌙 आज रात्रि सरस्वती घाट के आगे विश्राम के बाद, परिक्रमा दल कल प्रातः यात्रा के अंतिम पड़ाव — धुआंधार घाट की ओर प्रस्थान करेगा। वहाँ कन्या पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ इस वर्ष की पंचकोसी परिक्रमा यात्रा का पावन समापन होगा। इसके पश्चात सभी श्रद्धालु वहीं से अपने-अपने घरों की ओर लौटेंगे — मन में भक्ति, अनुभव में शांति, और हृदय में माँ नर्मदा का आशीर्वाद लेकर।
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