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करेली–गाडरवारा में गुड़ भट्टियों का ज़हरीला साम्राज्य

जिले की हवा इन दिनों मीठी नहीं, ज़हरीली हो चुकी है। गन्ने के मौसम के साथ ही करेली, गाडरवारा और आसपास के गांवों में सैकड़ों गुड़ भट्टियों की चिमनियां दिन-रात काला धुआं उगल रही हैं। आसमान तक उठते इन धुएं के गुबारों में घुला है वो ज़हर, जो धीरे-धीरे गांवों की ज़िंदगी को निगल रहा है।

अंधेरी रातों में दूर-दूर तक टिमटिमाती भट्टियों की आग जैसे मौत का मंजर बयां करती है। लेकिन प्रशासन? मौन है, मानो उसने धुएं के पीछे आंखें बंद कर ली हों।

🔥 खुलेआम धुआं, कोई रोक-टोक नहीं

करेली और गाडरवारा क्षेत्र में इस सीजन के दौरान तकरीबन दो से ढाई सौ गुड़ भट्टियां सक्रिय हैं। कई गांवों के भीतर, तो कुछ राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे खुलकर धुआं उगल रही हैं। इनमें से अधिकांश के पास प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति नहीं है, न सुरक्षा इंतज़ाम और न ही पर्यावरणीय मानक।

ग्रामीण बताते हैं कि रात के वक्त पूरा माहौल धुएं से भर जाता है। आंखें जलने लगती हैं, बच्चों को सांस लेने में तकलीफ होती है, और खेतों की फसलें राख से ढक जाती हैं। गन्ने की खुशबू की जगह अब धुएं का कसैलापन है — हवा में घुला जहर जो हर सांस को भारी कर रहा है।

😷 हवा में जहर, ज़मीन पर राख

विशेषज्ञों के मुताबिक इन भट्टियों से निकलने वाला धुआं केवल वातावरण को नहीं बिगाड़ता, बल्कि मिट्टी और पानी दोनों को प्रदूषित करता है। गांवों के तालाब और नालों में राख की परतें जम रही हैं। पशुओं के चारे तक में कालिख की गंध है। धीरे-धीरे यह ज़हर गांवों के शरीर में समा रहा है — लेकिन इसे रोकने वाला कोई नहीं।

“रात में जब हवा रुक जाती है तो पूरा गांव धुएं में डूब जाता है, बच्चों को सांस नहीं आती,” — एक स्थानीय किसान ने बताया।

💰 प्रशासन की खामोशी या मिलीभगत?

स्थानीय सूत्र बताते हैं कि इन गुड़ फैक्ट्रियों के पीछे रसूखदार और बाहरी कारोबारी सक्रिय हैं। बिना लाइसेंस के फैक्ट्रियां चलाना अपराध है, लेकिन फिर भी इन पर कोई छापा नहीं पड़ता। न पंचायतें कुछ बोलती हैं, न विभागीय अधिकारी।

सवाल उठता है — क्या प्रशासन की यह चुप्पी डर की है, या किसी अदृश्य हिस्सेदारी की? हर साल यही चक्र दोहराया जाता है — गन्ने का मौसम आता है, भट्टियां जलती हैं, हवा ज़हरीली होती है, और कुछ हफ्तों बाद सब सामान्य मान लिया जाता है।

⚠️ खतरे की चेतावनी

डॉक्टरों के अनुसार इस धुएं में मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर और राख के महीन कण बच्चों व बुजुर्गों के लिए गंभीर खतरा हैं। यह श्वसन संक्रमण, एलर्जी, और दीर्घकालिक फेफड़ों की बीमारियों का कारण बन सकता है। फिर भी इन फैक्ट्रियों पर कोई ठोस निगरानी नहीं है।

यह केवल गन्ने का व्यापार नहीं — यह हवा और ज़िंदगी के साथ व्यापार है।

🕳️ सवाल जो अब जवाब मांगते हैं

  • क्या जिले के प्रदूषण नियंत्रण विभाग को इन फैक्ट्रियों की भनक नहीं?
  • क्या बिना अनुमति सैकड़ों भट्टियां यूं ही जल सकती हैं?
  • और अगर नहीं — तो आखिर इनका संरक्षण कौन कर रहा है?

जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, जिले की हवा पर मंडराता यह काला धुआं हमारे भविष्य की सांसें रोकता रहेगा।

✍️ रिपोर्ट: Stringer24 टीम
📍 स्थान: करेली–गाडरवारा, जिला नरसिंहपुर
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