धर्मेन्द्र के मरने की खबर बताता रहा मीडिया!
परिवार ने किया खंडन — जबकि धर्मेन्द्र इलाजरत हैं
एक दौर था जब खबरें सच का आईना मानी जाती थीं। आज वही आईना झूठ और जल्दीबाज़ी की धूल से धुंधला पड़ गया है। धर्मेन्द्र के निधन की झूठी खबर फैलने के बाद परिवार ने जब खंडन किया, तो पूरा मीडिया जगत सवालों के घेरे में आ गया। आखिर, क्या अब खबरों से पहले ‘ट्रेंड’ चलाने की होड़ ने पत्रकारिता की आत्मा को ही बेच दिया है?
सच जानने से पहले खबर चला देना, अब "ब्रेकिंग" कहलाता है। पर यह भूलना नहीं चाहिए कि, जब खबर झूठी होती है — तो कोई परिवार सचमुच टूट जाता है।
पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है — पुष्टि के बिना प्रकाशन नहीं। लेकिन धर्मेन्द्र के मामले में इस सिद्धांत को रेटिंग्स की आग में जला दिया गया। किसी जीवित व्यक्ति को ‘मृत’ घोषित करना सिर्फ़ गैर-जिम्मेदाराना नहीं, बल्कि अमानवीय है। यह केवल गलती नहीं, बल्कि पत्रकारिता के चरित्र पर गहरा दाग है।
ऐसे मामलों में मीडिया को आत्ममंथन करना होगा। खबरें सिर्फ़ ‘पहले देने’ के लिए नहीं होतीं, बल्कि ‘सही देने’ के लिए होती हैं। क्योंकि पत्रकारिता अगर संवेदना खो दे, तो फिर वह केवल ‘प्रसारण’ रह जाती है — ‘प्रकाशन’ नहीं।
खबरों की इस भागदौड़ में कहीं ऐसा न हो कि, सच्चाई पीछे छूट जाए और झूठ की रफ्तार ही खबर बन जाए।
✍️ विशेष संपादकीय: STRINGER24 NEWS टीम
