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STRINGER24 NEWS
सत्य और समाज के बीच की कड़ी

हिडमा की मौत ने आदिवासियों को लेकर एक बार फिर खड़े किए बड़े सवाल?

छत्तीसगढ़-मध्य भारत के संवेदनशील बेल्ट में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में कुख्यात नक्सली कमांडर हिडमा के मारे जाने की खबर ने एक बार फिर उस बहस को तेज कर दिया है, जिसे वर्षों से दबाया जाता रहा—क्या हर बड़े ऑपरेशन के बाद सबसे ज्यादा असर आदिवासी समाज पर ही क्यों पड़ता है?

“हिडमा मरा, लेकिन क्या जंगल का विश्वास भी फिर एक बार घायल हुआ?”

ऑपरेशनों की सफलता की चर्चा तो खूब होती है, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में खड़े होते सवाल कहीं ज्यादा गहरे हैं—जमीन, अधिकार, सुरक्षा, विकास, प्रतिनिधित्व और ‘किसकी लड़ाई कौन लड़ रहा है’ वाली पहेली आज भी जस की तस है।

हिडमा की मौत के बाद एक वर्ग राहत की सांस लेता है, लेकिन दूसरा वर्ग डर और अविश्वास के साथ यह भी पूछता है कि इस इलाके में मौजूद आदिवासियों की आवाज़ कौन सुनेगा? वे जिनके नाम पर लड़ाइयाँ लड़ी जाती हैं, वे ही सबसे ज्यादा उपेक्षित क्यों रहते हैं?

“आदिवासी सिर्फ आंकड़ा नहीं हैं — वे इस धरती की असली आत्मा हैं, और हर कार्रवाई का असर सबसे पहले उन पर पड़ता है।”

सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि क्या बड़े ऑपरेशनों के बाद शासन-प्रशासन इन क्षेत्रों में भरोसे बहाली का कोई ठोस प्रयास करता है? या फिर यह चक्र—अभियान, एनकाउन्टर, तनाव, अविश्वास—यूँ ही चलता रहता है?

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