🐕🦺 जस्टिस विक्रम और जस्टिस संदीप का आदेश — आवारा कुत्तों पर सख्त लेकिन संवेदनशील नीति
सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल हैं, ने हाल ही में आवारा कुत्तों को लेकर ऐतिहासिक और मानवीय निर्णय सुनाया है। देशभर में बढ़ते कुत्ता-हमलों और सार्वजनिक सुरक्षा पर उठे सवालों के बीच यह आदेश न सिर्फ कानून की सख्ती दिखाता है, बल्कि पशु-संरक्षण के प्रति न्यायपालिका की संवेदना भी दर्शाता है।
📜 क्या कहा अदालत ने?
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 22 अगस्त 2025 के आदेश में कहा कि, आवारा कुत्तों को केवल पकड़कर स्थायी शेल्टर में रखना समाधान नहीं है। उन्हें नसबंदी (Sterilisation), टीकाकरण (Vaccination) और कीट-नियंत्रण (Deworming) के बाद उन्हीं स्थानों पर छोड़ा जा सकता है जहाँ से पकड़ा गया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि “मानव-सुरक्षा और पशु-अधिकार दोनों का संतुलन आवश्यक है”।
“कानून किसी को हिंसक जानवरों के प्रति निर्दयी बनने की अनुमति नहीं देता, पर नागरिकों की सुरक्षा भी सर्वोच्च है।”
– जस्टिस विक्रम नाथ, सुप्रीम कोर्ट
🏛️ सार्वजनिक स्थानों से हटाने के निर्देश
अदालत ने स्पष्ट कहा कि स्कूल, अस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और खेल परिसर जैसे संवेदनशील स्थानों पर आवारा कुत्तों की उपस्थिति नहीं होनी चाहिए। इसके लिए राज्य सरकारों, नगर निगमों और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को 8 सप्ताह के भीतर कार्यवाही रिपोर्ट देने को कहा गया है। यदि आदेशों का पालन नहीं होता है, तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी माना जाएगा।
⚖️ पहले और अब – नीति में बदलाव
11 अगस्त 2025 को अदालत ने निर्देश दिया था कि आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर में रखा जाए और उन्हें वापस न छोड़ा जाए। लेकिन पशु-कल्याण अधिनियम एवं Animal Birth Control (Dogs) Rules, 2023 को ध्यान में रखते हुए नई बेंच (जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता) ने निर्णय को संशोधित किया — अब यह आदेश अधिक संतुलित और व्यावहारिक माना जा रहा है।
🐾 लेकिन नरसिंहपुर में हालात उलटे!
आदेश तो सख्त हैं, मगर नरसिंहपुर नगर क्षेत्र में इन नियमों की खुलेआम अवहेलना हो रही है। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और वार्डों की गलियों में दर्जनों आवारा कुत्ते झुंड में घूमते हैं। सुबह के समय जब नगर पालिका के सफाई कर्मी काम पर निकलते हैं, तो कई बार उन्हें कुत्ते दौड़ाने लगते हैं। कई कर्मचारियों ने बताया कि वे ड्यूटी पर निकलते समय डंडा साथ रखते हैं, क्योंकि आवारा कुत्ते हमला कर देते हैं। बावजूद इसके, प्रशासन की कार्रवाई सीमित कागज़ों तक सिमटी हुई है।
🖋️ संपादकीय दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मानव और पशु दोनों के अधिकारों का संतुलन बनाए रखने का प्रयास है। लेकिन जमीनी स्तर पर यदि नगरपालिकाएँ और स्थानीय निकाय इस पर गंभीर नहीं हुए, तो न तो नागरिक सुरक्षित रहेंगे और न ही पशु-संरक्षण की भावना बचेगी। नरसिंहपुर जैसे शहरों में अब यह देखना जरूरी है कि अदालत के आदेश केवल खबर न बनें, बल्कि सड़कों और मोहल्लों में उसकी गूंज महसूस हो।
