दीपावली से पहले जब गाँवों में सफाई, साज-सज्जा और रोशनी की तैयारी चल रही है — पंचायत दफ्तरों में कुछ और ही “रोशनी” जल रही है। यहाँ अकाउंट बुक्स में अचानक फर्जी बिलों की बरसात शुरू हो गई है।
सूत्र बताते हैं कि कई ग्राम पंचायतों में पुरानी योजनाओं के नाम पर रसीदें जोड़ी जा रही हैं। काम जमीन पर नहीं, कागजों में पूरे किए जा रहे हैं। एक क्लिक से सरकारी पोर्टल पर अपलोड और तुरंत पेमेंट क्लियर — मानो दीपावली बोनस की तरह खुद के लिए सरकारी कोष लूटने का खेल चल पड़ा हो।
सरपंच–सचिव–जीआरएस की यह तिकड़ी अब चर्चा में है। जनप्रतिनिधियों की भूमिका सवालों में है — क्या यह भ्रष्टाचार की परंपरा बन चुकी है? हर त्यौहार से पहले सरकारी राशि की लूट का यह सिलसिला आखिर कब रुकेगा?
ग्रामीणों का कहना है कि कई काम बिना टेंडर और बिना प्रस्ताव के पास हुए हैं। “सड़क टूटी है, पर भुगतान पूरा,” एक ग्रामीण ने कहा। दूसरी तरफ, पंचायत अधिकारी जांच की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं।
सवाल यही है — क्या हर दीपावली पर “विकास” की आड़ में सरकारी खजाने का दीया बुझा दिया जाएगा?
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