गाँव-गाँव से उठ रही कराह — पर अफसरों के कान बंद!
जनपद की ग्राम पंचायतों में जो नंगा नाच चल रहा है, वह अब किसी छिपे हुए किस्से जैसा नहीं रहा; यह खुला-खुला गबन है — और पीड़ित गरीब ग्रामीण हैं जो अपनी आवाज़ दबते-जाते देखते हुए रो रहे हैं।
क्या चिचली जनपद के सीईओ को कमीशनखोरी की इस मंडली की खबर नहीं?
मोहपानी ग्राम पंचायत में जेसीबी से बने तालाबों में जो गड़बड़ियाँ सामने आई हैं, वे सिर्फ तकनीकी चूकों से बढ़कर भ्रष्टाचार की गंध बिखेरती हैं — और वहाँ के जिम्मेदार अफसर बेशर्मी की चादर ओढ़े बैठे हैं? शिकायतें दर्ज हैं, सबूत हैं — फिर भी कार्रवाई नहीं, सिर्फ शिकायतों को दबाने और बंद करने की साजिशें!
और ये एक isolated मामला नहीं — मालनवाड़ा नारगी की कहानियाँ तो और भी दर्दनाक हैं। स्टेशनरी के नाम पर काटे गए हजारों-लाखों रुपये, जलेबी-सी उलझी रसीदें और पीड़ितों की निष्ठुर आँखें — सब कुछ सूचित करता है कि किस तरह जनता के पैसों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
किसके लिए यह सिस्टम? किसकी सुरक्षा में यह सब हो रहा है?
जब गबन करने वालों को न तो कानून का भय है और न ही सलाखों का डर, तो सुप्रीम जिम्मेदारी किसकी बनती है? जनपद प्रशासन — खासकर सीईओ आवास — क्या सो रहा है? या सोने का बहाना सिर्फ बेइमानी के लिए है?
अब और सहन नहीं होगा — ग्रामीणों की आपबीती अब बस शर्मिंदगी नहीं, चेतावनी है।
हम मांग करते हैं: शिकायतों की पारदर्शी जांच, जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई और खोए हुए संसाधनों की वसूली। चिचली जनपद प्रशासन की नींद जितनी गहरी है, ग्रामीणों का दर्द उससे कहीं अधिक तीखा है — और यह घड़ी जवाब मांगने की है।
> अब सवाल यह है — जब पंचायत के तालाब में जेसीबी चलाने से ज़्यादा रुपये अफसरों की जेब में चले गए, तो आखिर जनता की प्यास कौन बुझाएगा?
जिन हाथों से विकास की कलम चलनी थी, वहीं से “कमीशन” की गिनती हो रही है। फाइलें बंद, रसीदें गायब, और कार्रवाई का नाम पर सन्नाटा!
चिचली जनपद का सिस्टम अब जैसे “सत्य” से allergic हो चुका है — सच बोलो तो ट्रांसफर, शिकायत करो तो धक्का!
लोग पूछ रहे हैं — क्या इस भ्रष्टाचार का भी कोई “ठेकेदार” है, जो हर बार फाइलें बचा लेता है?
ग्रामीण कहते हैं, “साहब तो हर बार कहते हैं — जाँच होगी, पर अब तक हुआ सिर्फ गबन का विस्तार और न्याय का इंतज़ार।”
सवाल फिर वही — क्या सीईओ का दफ्तर अब सिर्फ कमीशनखोरी का गेस्टहाउस बन गया है?
> मोहपानी और मालनवाड़ा की मिसालें तो बस एक झलक हैं —
जनपद चिचली की दर्जनों पंचायतों में ऐसे “विकास कार्य” चल रहे हैं जो कागज़ों में बनकर झील हैं और ज़मीन पर बस धूल!
पंचायत सचिवों और अफसरों की मिलीभगत ने तो अब “भ्रष्टाचार” को एक वैध कारोबार बना दिया है।
कोई मीटिंग बिना लिफाफे के नहीं होती, कोई फाइल बिना कमीशन के नहीं खुलती!
जो अधिकारी जनता की सेवा के लिए तनख्वाह लेते हैं, वही जनता को ठगने की ठानी बैठे हैं।
ये वही सिस्टम है जहाँ गुनहगार मुस्कुराता है — और शिकायतकर्ता को चुप करा दिया जाता है।
अब हालात इतने नीचे गिर चुके हैं कि गाँवों में लोग कहने लगे हैं —
“जनपद का हर तालाब सीईओ की नींद में खोद दिया गया है!”
सवाल उठता है — अगर यही हाल रहा, तो अगले साल पंचायत भवनों पर बोर्ड लगवाना पड़ेगा —
“यहाँ विकास नहीं, भ्रष्टाचार की खेती होती है।”
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