लापरवाही से गौशाला की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
📍 ग्राम पंचायत बसुरिया | जनपद चिचली | जिला नरसिंहपुर
जहां गाय को मां कहा जाता है, वहां आज उसकी लाशें खुले गड्ढों में सड़ रही हैं। यह दृश्य किसी कत्लखाने से कम नहीं — बस नाम भर गौशाला का है। ग्राम पंचायत बसुरिया की यह गौशाला इंसानियत पर एक करारा तमाचा है।
यहां न तो गायों की उचित देखभाल हो रही है, न ही मृत गायों का सम्मानजनक अंतिम संस्कार? मृत गायों को बस खुदे हुए गड्ढों में फेंक दिया गया! — मिट्टी तक नहीं डाली गई? ऐसा लगता है मानो इनकी मृत्यु पर किसी की संवेदना ही मर चुकी हो!
स्थानीय युवक द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो ने इस ‘गौशाला’ की सच्चाई को उजागर कर दिया। वीडियो में मृत गायों के शव खुले में पड़े देखे जा सकते हैं — चारों ओर गंदगी, बदबू और सन्नाटा। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की आत्मा को झकझोर देने के लिए काफी है।
जिले के उच्च अधिकारी और जनपद स्तरीय प्रशासन की चुप्पी इस काले सच पर पर्दा डाल रही है! सवाल यह है कि आखिर किसके भरोसे छोड़ी गई हैं ये गौमाताएं? क्या सरकारी योजनाओं का लाभ सिर्फ कागजों में सीमित है?
क्या ये वही देश है जहां गाय को पूजनीय माना जाता है?
क्या गौशाला बनाना सिर्फ एक दिखावा रह गया है?
क्या अधिकारियों के लिए गायों की लाशें अब ‘रिपोर्ट’ का हिस्सा भी नहीं रहीं?
एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में इस तरह की लापरवाही की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, विशेष रूप से तब जब सरकार से दान और सहायता राशि प्राप्त हो रही हो। यह न केवल धार्मिक, बल्कि नैतिक पतन का भी संकेत है।
गौशाला के प्रबंधन से लेकर स्थानीय प्रशासन तक — सभी की जिम्मेदारी बनती है कि इस अमानवीय स्थिति को तुरंत सुधारा जाए। अन्यथा, यह “गौशाला” शब्द भारत की आस्था का सबसे बड़ा मज़ाक बन जाएगी।
“जहां इंसान सो गया, वहां करुणा मर गई।”
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