गौ माता के नाम पर राजनीति करने वालों से लेकर तथाकथित धर्मरक्षकों तक — सबकी जीभ पर भक्ति है, लेकिन सड़कों पर कराहता हर गाय उनकी भक्ति का असली आईना दिखा रहा है। मंदिरों में घंटियां बजती हैं, भाषणों में जयघोष गूंजते हैं, मगर नगर की नालियों के किनारे वही पवित्र गौवंश कचरे के ढेर में मुंह डालकर पॉलीथिन निगल रहा है।
यह कैसी भक्ति है जिसमें गौशालाओं के नाम पर कोष लूटा जा रहा है, लेकिन सैकड़ों गायें बिना चारे-पानी के दम तोड़ रही हैं? सड़क किनारे तड़पती गायें न तो किसी मंत्री को दिखती हैं, न किसी धर्मसभा को। जब तक चुनाव नहीं आते, गौ माता के नाम पर सब मौन हैं। जैसे ही वोट की घंटी बजती है, ‘गौ सेवा’ के पोस्टर फिर से सज जाते हैं।
कचरे में पड़ी हर गाय हमारे समाज के दोहरे चरित्र पर प्रश्न है — कहां है वह संवेदनशीलता? जहां एक तरफ दान-पुण्य के नाम पर करोड़ों जुटाए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ उसी भगवान का प्रतीक मानी जाने वाली गाय पॉलीथिन के जहर से मर रही है।
प्रशासन की उदासीनता और समाज की चुप्पी, दोनों ही इस अपराध के भागीदार हैं। नगरपालिकाओं ने सफाई के नाम पर झंडे गाड़े हैं, लेकिन सड़कों पर बिखरे कचरे के बीच यह मौन हत्याकांड हर दिन चल रहा है। कोई आवाज नहीं उठाता क्योंकि यह मौत इंसान की नहीं — “गौ माता” की है, जो अब केवल नारे में जिंदा है।
अगर यही हमारी भक्ति है, तो यह भक्ति नहीं, पाखंड है। यह शर्म की बात है कि जिस देश में गाय को “माँ” कहा जाता है, उसी देश में वह सबसे अधिक अपमानित, भूखी और बीमार घूम रही है। धर्म का असली अर्थ संरक्षण था, न कि प्रदर्शन।
अब वक्त है सवाल करने का — मंदिरों की दीवारों पर टंगी तस्वीरें और सड़कों पर सड़ता शरीर — इनमें असली गौभक्ति कहां है?
अगर समाज अब भी नहीं जागा, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ इतिहास पढ़ेंगी — कि “भारत कभी गौभक्त देश कहलाता था”।
