देश प्रदेश : एक वक्त था जब सास को मां कहा जाता था, और दामाद को बेटे का दर्जा। लेकिन वक्त ने करवट ली — अब ये रिश्ता ‘मां-बेटा’ नहीं, ‘प्यार-विवाद’ का प्रतीक बन गया है।
समाज में रिश्तों की एक तय परिभाषा होती है—सास मां के समान और दामाद बेटे के समान। लेकिन जब यही रिश्ता “समानता” से आगे निकल जाए, तो कहानी समाज की नहीं, सुर्खियों की बन जाती है।
अलीगढ़ से लेकर कासगंज तक सास-दामाद के नाम पर जो कहानियाँ सामने आई हैं, उन्होंने गांवों की चौपाल से लेकर सोशल मीडिया की टाइमलाइन तक सबको चौंका दिया है।
अब समाज के लिए सवाल बन गया है।”
कासगंज की घटना में तो मामला इतना बढ़ा कि रिश्ते का अंत हत्या में बदल गया।जब अलीगढ़ में सास अपने दामाद के साथ भाग गई, तब गांव वालों ने कहा — “अब सीरियल से ज़्यादा ड्रामा तो असलियत में है।”
सोशल मीडिया पर किसी ने इसे ‘नया प्यार’ लिखा तो किसी ने इसे ‘नया पाप’। किसी ने लिखा — “रिश्ते पवित्र नहीं रहे, अब ट्रेंडिंग हो गए हैं।” तो किसी ने तंज मारा — “अब दामाद बुलाने से पहले KYC जरूरी है।”
क्या रिश्ते अब भी पवित्र हैं, या सिर्फ नाम के खोल में छिपी इच्छाओं का खेल? गांव की चौपाल से लेकर शहर की गली तक अब लोग यह पूछ रहे हैं : “प्यार अंधा होता है, लेकिन क्या रिश्ता भी?”
कोई इसे नई सोच कह रहा है, तो कोई इसे सामाजिक सड़ांध। जो रिश्ते कभी “आदर” और “मर्यादा” के प्रतीक माने जाते थे, आज वही क्लिप्स, मीम्स और रील्स बन रहे हैं।
हर किसी के पास अपनी दलील है —
कोई कहता है “दिल तो दिल है, उम्र या रिश्ता नहीं देखता।”तो कोई पलटकर पूछता है — “अगर दिल ही सब कुछ है, तो संस्कार किस दिन काम आएंगे?”
यही समाज की सच्चाई है — यहाँ प्यार को गुनाह गुनाह को ट्रेंड बनने में ज़्यादा वक्त नहीं लगता।
शायद इसलिए अब सवाल यह नहीं कि रिश्ते पवित्र हैं या नहीं...
असली सवाल यह है कि — हम पवित्रता को समझना भी चाहते हैं या बस उसकी बात करके मनोरंजन लेना?
यह सच है कि समाज में ऐसे रिश्ते हमेशा से रहे हैं, बस पहले दीवारें ऊंची थीं और अब मोबाइल कैमरे खुले हैं। फर्क इतना है कि अब हर घटना सुर्खियों में है, और हर प्यार एक ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बन गया है
लेकिन बड़ा सवाल यही है — क्या रिश्ते अब भी पवित्र हैं, या बस नाम के खोल में छिपी इच्छाओं का खेल?
कभी ये रिश्ते घर की इज़्ज़त थे,
अब इन्हीं पर बन रहे हैं मीम, रील और वायरल क्लिप्स।
प्यार, संस्कार और समाज — तीनों की लकीरें अब धुंधली पड़ चुकी हैं।
सवाल ये नहीं कि सास-दामाद गलत हैं या सही… सवाल ये है कि अब समाज को “मर्यादा” चाहिए या “मनोरंजन”?
“रिश्ते अब घरों में नहीं, न्यूज़ फीड में बसते हैं।”
रिपोर्ट — Stringer24 News Desk
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