*जो सरपंच पति अपनी पत्नी के अधिकारों का हनन कर सकता है, वह पंचायत में गबन भी कर सकता है?*
जहां भी महिला सरपंच है,अमूमन हर ग्राम पंचायत में एक जैसे ही हालात है!
सरपंच पति प्रथा एक ऐसा बदनुमा दाग है जो ना सिर्फ महिला सशक्तिकरण पर सवालिया निशान लगा रहा है बल्कि गांव के विकास को भी दांव पर लगा दिया है!
सिस्टम जिस तरह से काम कर रहा है,आप बिल्कुल भी न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते हैं और ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि, ना ही वे किसी न्यायिक अवधारणा पर काम कर रहे हैं?सिर्फ तिजोरियां भरना नौकरशाहों का काम रह गया है?
जिला कलेक्टर को ही देख लीजिए!आज तक कितने कलेक्टर ने स्वतः संज्ञान लेकर ग्राम पंचायत के गबन पर कोई ठोस कार्रवाई की है?कलेक्टर गांव का दौरा करते हैं और गांव के हालात से अनजान हैं! ये कैसा दौरा है?
पत्नी के पद ग्रहण करते ही सरपंच पति पत्नी का फोन हथियाने को लालायित रहता है,क्यों कि ओटीपी और लेन देन का सारा खेल तो उसी मोबाइल से होता है!
आप लगाते रहो फोन, ,सरपंच से बात करने के लिए!लेकिन मजाल कि सरपंच पति के हाथों से फोन छूट जाए और सरपंच से बात हो पाए!
उसके बाद नंबर आता है कुर्सी का!पंचायत में पत्नी को तो कभी भेजते ही नहीं है!खुद कुर्सी तोड़ते हैं और पत्नी बेचारी रोटी सेक रही है,बर्तन मांज रही है! भैया जी,पंचायत में काला पीला करते फिर रहे हैं और पत्नी बेचारी यह भी नहीं जानती कि,उसने बिल्ली को दूध की रखवाली दे दी है!
सरपंच पत्नी को तो यह भी नहीं मालूम रहता है कि,पति ने उसके पद के नाम पर कितने गरीब गांव वालों के अधिकारों का हनन किया,किस - किस से रिश्वत ली और किस गरीब के आवास और तालाब का पैसा खा गया!
जनपद और ग्रामीण बैठकों में भी सरपंच पति ही अपना बर्चस्व बनाए रहते हैं!यहां सरपंच घर में उपले थोप रही हैं और उधर सरपंच पति बैठकों का प्रतिनिधित्व कर रहा है!
आखिर यह सब क्यों चल रहा है?
जाहिर सी बात है कि जब प्रत्येक बिल और कार्य पर पांच से पंद्रह प्रतिशत की राशि मिलती हो तो कौन सा अधिकारी या कर्मचारी इस मलाई को छोड़ेगा?और लोग कहते हैं कि हम भ्रष्टाचार की शिकायत करते हैं फिर भी कोई कार्यवाही नहीं होती है!कोई सुनवाई नहीं होती है!
जारी :
