।। विवेचना ।।
*सचिव के हाथों डूब रही गांव की नैया या फिर जीआरएस है भ्रष्टाचार की इस नौका का खिवैया?*
जिले के विभिन्न ग्रामीण अंचलों के हालातों में अधिक असमानता नही है।भ्रष्टाचार,गबन, हेर फेर और गोलमाल से जुड़ी खबरों से आए दिन अखबार और डिजिटल मीडिया के पेज पटे रहते हैं।
अभी हाल ही में एक ग्राम पंचायत के भ्रमण के दौरान पंचायत के अधिकारियों ने ऑफ कैमरा कहा कि,गांव में ग्राम रोजगार सहायक अधिक गोलमाल करते हैं, सचिव की अपेक्षा।उसकी वजह उन्होंने बताई की आमतौर पर जीआरएस गांव का ही होता है इसलिए उसे गांव की सारी जानकारियां रहती है और लोगों से व्यक्तिगत जुड़ाव भी होता है जिसका भरपूर फायदा ग्राम रोजगार सहायक उठाता है।यह बात कहने वाला शख्स खुद भी ग्राम पंचायत में सचिव के पद पर कार्यरत है।
यहां सवाल यह उठता है कि,क्या सरपंच और सचिव ग्राम रोजगार सहायक को बलि का बकरा बनाते हैं? करे कोई भरे कोई की तर्ज पर गबन की शिकायतों में सिर्फ ग्राम रोजगार सहायक ही निशाना बनाए जाते है और बड़ी मछलियां बचाई जाती हैं!क्या यह संभव है की ,बिना सचिव, सरपंच, इंजिनियर, ठेकेदार, जनपद और जिला अधिकारियों की मदद और जानकारी के बिना कोई ग्राम रोजगार सहायक लाखों करोड़ों का गोलमाल कर सकता है?
हालाकी सचिव और सरपंच पर अधिकारी मेहरबान रहते हैं,ऐसी अनेक फाइलें हैं जिन पर रिकवरी के आदेश निकले हुए हैं लेकिन रिकवरी का कोई पता ठिकाना ही नही! यह मेहरबानी किसलिए?
ग्राम रोजगार सहायक उत्पीड़न के इस दंश को सह रहे हैं,वे ऐसे हालात में बेबस है,यदि हेर फेर ना भी करना चाहें तो ऊपरी चेन से दबाव बनाया जाता है।ऐसे अनेक ग्राम रोजगार सहायक है जो काम के इस तनाव के चलते अवसाद का शिकार है।
ऐसा नहीं है कि सभी ग्राम रोजगार सहायक एक ही मानसिकता के हैं।देखिए अपवाद हर जगह मौजूद होते हैं लेकिन अपवादों को उदाहरण नहीं बनाया जा सकता है।
प्रशासन आमतौर पर जांच की बनावटी कार्यवाही के जरिए अपने दायित्व निर्वहन का ढिंढोरा पीटता है लेकिन आज भी गबन और हेर फेर की सैकड़ों फाइलें विभागों की अलमारियों में बंद न्याय की बाट जोह रही है,वह न्याय जो शायद कभी मिल ना सकेगा,क्यों की तंत्र को भ्रष्टाचार की दीमक ने खोखला कर दिया है?
दरअसल अभी कुछ दिनों पूर्व ही खुफिया सूत्रों से जानकारी प्राप्त हुई की,जनपद और जिला अधिकारियों की डिमांड रहती है कि दस पर्सेंट दो और पैसा निकाल लो, शासन द्वारा सरकारी खातों में पहुचाया गया वह पैसा जो गरीब जनता का है दस प्रतिशत पर उसकी बोली लगाई जा रही है?
लाखो करोड़ों रुपए की हेर फेर से यह तो साबित होता है कि,जिले में भ्रष्टाचार चरम पर है। एक तरफ अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा की तर्ज पर भ्रष्टाचार की रेवड़ियां बट रही है और दूसरी तरफ गरीब,मजदूर, किसान, आदिवासी विकास और न्याय की आस लगाए बैठे हैं।
अपडेट जारी :
वैसे कुछ ग्राम पंचायत ऐसी भी हैं जहां, सरपंच सचिव और ग्राम रोजगार सहायक की तिकड़ी मिलकर
