।। विवेचना ।।
नकली मिठाई बिक गई? : जिम्मेदार कौन?
दरअसल सरकारी खानापूर्ति की एक तय नियमावली है,आदेश दे दिए जाते हैं लेकिन अधीनस्थ कार्य कितनी कुशलता से कर रहे हैं या फिर कर भी रहे हैं की नही इस बारे में विचार करने की जहमत नहीं उठाई जाती।
त्योहारी सीजन आते ही त्यौहार के एक दो दिन पहले एक आदेश निकलता है, गिनी चुनी दस बीस खास दुकानों से सैंपल बटोरे जाते हैं और हैरानी की किसी भी नमूने में कोई घालमेल कभी पाया ही नहीं जाता। जहां घालमेल पाए जाने की संभावना होती है,वहां मैनेज कर लिया जाता है?
जांच की शैली इतनी लचर है की , रिपोर्ट आने तक मिठाई बिक चुकी होती है। कहा तो यह जाता है कि,विभाग तो जांच के नाम पर खाना पूर्ति करता है।जांच औपचारिकता मात्र बनकर रह गई है।अब इसमें कितनी सच्चाई है यह जांच का विषय है,भले ही रिपोर्ट अरसे बाद आए।
वैसे तो सालभर मिलावटखोरी का खेल चलता है, लेकिन खाद्य सुरक्षा एवं औषधि विभाग के अधिकारी व कर्मचारी की चुप्पी की वजह साफ़ नही हो पाती है!
फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड अथॉरिटी आफ इंडिया के निर्देशों का पालन कराने वाले जिम्मेदार नकली मिठाई बिक जाने पर क्या लोगों के खराब स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार नहीं हैं?
किस मिठाई को कब तक उपयोग करना है,इसकी सूचना प्रदर्शित करती हुई एक्सपायरी डेट मिठाई के डिब्बे पर कहीं दिखाई नहीं देती है।
खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत जारी बिना लाइसेंस कारोबार करते पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है लेकिन कितनी दुकानों के लाइसेंस नहीं है,क्या विभाग इस मामले से अनभिज्ञ है?
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक त्योहारी मौसम आते ही खाद्य एंव औषधि विभाग के अधिकारी व कर्मचारी भी सक्रिय हो जाते हैं , कहा तो यह भी कहा जाता है कि विभाग के द्वारा छापेमारी वही की जाती है, जहा से लिफाफा नहीं आता है। कथित तौर पर यह भी सामने आया कि, दुकानों पर मिलावटी सामान विक्रय किये जाने पर सम्बन्धित कर्मचारी वहां पहुंचकर मोटी रकम वसूलते है।
ध्यान रखिए की कहीं आप मिठाई के नाम जहर तो नहीं खा रहे हैं? यह कोई नई बात नहीं है। लचर व्यवस्था के आगे सभी लोगों को सावधान होने की जरूरत है।वरना फ़ूड प्वाइजनिंग या अन्य बीमारियों का सामान करना पड़ सकता है।
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