।। विवेचना ।।
*कब बनोगी सशक्त ?*
पत्रकारिता के इस पेशे के दौरान मेरा अधिकतर समय दौरों पर ही गुजरा है।ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएं और समाधान के विश्लेषण के दौरान मैंने ग्रामीण जीवन को बहुत नजदीक से देखा है।इस दौरान हर जगह ग्रामीणों से अपार स्नेह मिला।
हमारी आज की विवेचना का यह विषय *कब बनोगी सशक्त?* महिला सशक्तिकरण के दावे की हकीकत को बयां करता है।
देखिए आज आप इस सच से इंकार नहीं कर सकते हैं कि, जिन गांवो में महिला सरपंच है, अधिकतर वहां कुर्सी पर या तो ससुर काबिज है या पुत्र या फिर पति।पत्नी को सरपंच कहा तो पति को सरपंच पति को एक अघोषित उपाधि मिली। इन श्रेणियों के अलावा एक और विशेष श्रेणी है ,इन्हे आप साफ तौर पर फर्जी सरपंघ कह सकते हैं।
दरअसल ये फर्जी सरपंच अक्सर वो होते हैं जो तमाम कानूनों को अपनी जेब में रखकर अधिकारियों की मदद से कमीशन की दम पर पेरेलल पंचायत चलाते हैं।खैर फिलहाल हम अपने मुद्दे पर वापस आते हैं।
*कब बनोगी सशक्त ?* *(एक सवाल खुद से ही।)
दरअसल जिले की अनेकों ग्राम पंचायतों में कवरेज और भ्रमण के दौरान मैंने देखा कि,,महिला सशक्तिकरण का नारा तो सिर्फ कागजी है।
यहां हम महिला सरपंच के सम्मान और निजता का ध्यान रखते हुए पात्र और स्थान का नाम बदल रहे हैं।
आमतौर पर यह देखने में आता है कि, सरपंच कभी पंचायत भवन नही आती है,जबकि यह तो उनका दायित्व है कि वे अपने कार्य का समय कार्यकाल को दें।लेकिन जैसा कि हमने अभी ऊपर कहा था कि ,महिला सशक्तिकरण का नारा सिर्फ कागजी है।
मैं यह नहीं कहता कि पति को कभी भी पंचायत में नहीं जाना चाहिए लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए की इससे महिला के दायित्व निर्वहन में व्यवधान नहीं होना चाहिए।
आज आम तौर पर एक महिला सरपंच के जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया है। घर के चूल्हे चौके और दैनिक कामकाज में उलझे जीवन के बीच अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की खानापूर्ति ही समस्या की मूल जड़ है।महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए, अगर पति पंचायत में जाने से रोकता है तो कानूनी सहायता ली जा सकती है लेकिन "अब कौन झंझट पाले ,चलो इन्ही को चले जाने दो,मेरा क्या है?" की ब्रत्ति से नारी अब तक बाहर नहीं निकल पाई है।
जनता बड़े विश्वास से अपने और अपने गांव के विकास के लिए सरपंच पद के लिए किसी का चुनाव कर चयन करती है लेकिन कितने दुर्भाग्य की बात है कि, सरपंच पद सम्हालते ही महिला सरपंच द्वारा अपनी जिम्मेदारियां भुला दी जाती है।
कुछ ग्राम पंचायतों में तो हालात यहां तक की है की महिला सरपंच के स्थान पर सरपंच पति या फिर फर्जी सरपंच हस्ताक्षर कर रहे हैं।क्या यह गांव की गरीब जनता के विश्वास को धोखा देना नही है?
कितनी ऐसी पंचायतें हैं जिनमें ग्राम सभा होती है और वहां महिला सरपंच मोजूद होती हैं।जिले की तकरीबन साढ़े चार सौ पंचायतों में से उंगलियों पर गिनने लायक नाम भी मिलना यहां मुश्किल है।यही कड़वा सच है, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है।
कहते हैं कि, पुरुष की सोच एक लंबे समय तक यह रही है कि, स्त्री सत्ता नही सम्हाल सकती है!क्या इसकी वजह यह नही है की ,ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी महिलाएं आगे आकर अपनी जिम्मेदारी नहीं उठाना चाह रही है? या फिर यह संभव है कि,डर,दबाव और प्रलोभन के कारण महिलाएं चुप्पी साधे हुए हैं।
मेरी समझ के बाहर है,जब जनता ने आपको चुना है, शासन ने आपको जिम्मेदारी दी है, तो फिर आपने इसे रेवड़ी समझकर कैसे बाट दिया?सरपंच की कुर्सी किसी किराने की दुकान की गद्दी नही होती है।यह एक जिम्मेदारी है।क्या एक सरपंच होने के नाते वाकई आपको अहसास है अपनी जिम्मेदारियों का?
गांव की तस्वीर बदली जा सकती है लेकिन यह तब संभव है जब आप चाहें।यह पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है।क्यों नही एक पंच वर्षीय कार्यकाल का पूरा पैसा ईमानदारी से लगाते हैं?अधिकारी को भी कमीशन चाहिए,ठेकदार और इंजीनियर को भी अपना हिस्सा चाहिए,सचिव और जीआरएस को पेट्रोल और दैनिक दौड़ भाग का खर्चा तो कम से कम चाहिए ही,इतना ही नहीं, इसके बाद फिर आरटीआई को मेंटेन करो, सीएम हेल्प लाइन को हैंडल करो, सरपंच आटे में नमक चाहता है, लेकिन यहां तो नमक में आटा हो जाता है!
पंचायत की भ्रष्ट शैली से पैदा हुए भस्मासुर अब अपने आतंक का जलवा दिखाने लगे हैं। इन भस्मासुरों को पैदा करने की जिम्मेदार यदि पंचायत नही है तो फिर कौन है?(पंचायत के भस्मासुर:पढ़िए अगले अंक में।)
देखिए समस्याओं के पीछे ही उनके समाधान छिपे होते हैं,यदि महिला सरपंच अपने दायित्व करने लगे,नियमित पंचायत और ग्राम सभा एवम अन्य मीटिंग इत्यादि में उपस्थित हो और प्रत्येक दस्तावेज स्वयं जांचकर हस्ताक्षर करे तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित होगा।
लेकिन सवाल अब तक तो वही है कि, *कब बनोगी सशक्त ?*(एक सवाल खुद से ही।)
