पुतला दहन के निर्णय से ऐसा प्रतीत होता है जैसे, धरने पर बैठे किसान और ग्रामीण शासन और प्रशासन को यह बतलाना चाह रहे हैं की न तो चुप बैठेगें और न ही शासन-प्रशासन को चैन की नींद सोने देंगे!
बेरोज़गारी, महंगाई के खिलाफ किए जाने वाला पुतला दहन बताता है कि,शासन और प्रशासन की नीतियों को लेकर ग्रामीण आम जनता में गहन आक्रोश है।
पेट्रोलियम पदार्थों और गैस सिलेंडर के दामों में लगतारा वृद्धि ने मध्यम वर्गीय और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों की कमर तोड़कर रख दी है।
वर्तमान सरकार का मंहगाई पर कोई नियंत्रण नहीं दिखता।वहीं जन प्रतिनिधि भी मंहगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर आम जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं।
आवश्यक वस्तुओं के दाम में बेतहाशा वृद्धि को किस दृष्टिकोण से आम आदमी के हित में कहा जा सकता है?
विगत दिनों के घटना क्रमों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि,ग्रामीणों ने अथक प्रयास से प्रशासन की निद्रा तो भंग कर दी है किंतु अब भी कुछ जिम्मेदार खुमारी से बाहर नही आ सके हैं।
ग्रामीणों की मेहनत और लगन का ही परिणाम है की प्रशासन द्वारा धरने और आंदोलन में उठी मांगो पर विचार कर आवश्यक कदम उठाए गए।हालाकी अब भी इन्हे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है।
प्रशासन को इस बारे में गौर करना चाहिए की आखिर क्यों ग्रामीण और किसान सड़क पर उतरने के लिए मजबूर हो रहे हैं,यदि ऐसे ही हालात रहे तो आने वाले दिनों में प्रशासन को और भी धरने और आंदोलनों के जरिए जिलेवासियों के आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है।
