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सत्य और समाज के बीच की कड़ी
मेरी नर्मदा तुम्हारा विज्ञान - 'आत्महत्या' का नाम दे दिया जाता!

सबसे पहले तो उन लोगों के लिए एक बात स्पष्ट कर दूँ—जो हर बात में व्यर्थ ही विज्ञान की टांग घुसेड़ने लगते हैं, या बिना सिर-पैर के अशोभनीय टिप्पणियाँ करने पहुँच जाते हैं। कृपा करके इस पोस्ट से दूर रहें।

लोग अक्सर बड़ी बेबाकी से कह देते हैं कि नर्मदा कोई चमत्कार नहीं करती, वह सिर्फ एक साधारण सी नदी है—फिर इसके बारे में इतना क्यों लिखते हो? लेकिन वे भूल जाते हैं कि विज्ञान की प्रयोगशालाओं से परे भी एक विराट दुनिया है। 

हर चीज़ के दो पहलू होते हैं; अगर सुबह है, तो शाम भी है; अगर धरती है, तो आकाश भी है; और अगर इस दुनिया में विज्ञान है, तो अध्यात्म की वह अनंत थाह भी है जिसे तराजू में नहीं तौला जा सकता।

सच तो यह है कि यह नर्मदा मुझसे बात करती है, और यह इस जीवन का सबसे अकाट्य सत्य है—मैंने खुद सुनी है इसकी आवाज़। 

लेकिन तुम... तुम इसे कभी नहीं समझ सकोगे, तब तक तो बिल्कुल नहीं, जब तक अपनी उस चौबीसों घंटे की 'समझ' और तर्कों के चश्मे को दूर नहीं रख देते। चमत्कार देखने के लिए आँखें नहीं, विसर्जित होने वाला मन चाहिए!

यह नर्मदा और एक तटवासी का अत्यंत व्यक्तिगत और आत्मीय वार्तालाप है। अपनी संकीर्ण बुद्धि पर ज़्यादा ज़ोर मत डालिएगा कि "वो तो नदी है, वो क्या बोलेगी?" जिसे अहसास नहीं, उसे यह संवाद कभी समझ नहीं आएगा।

नर्मदा के तट पर खड़े होकर कई बार ऐसा खिंचाव महसूस होता है कि मन करता है बस इसी अथाह जलराशि में उतर जाऊं, इसी की अनंत गहराई में कहीं हमेशा के लिए खो जाऊं।

उस बहते हुए पानी और सन्नाटे के बीच अपना होना और न होना एक ही सा लगने लगता है। लगता है कि अपने बिखरे हुए अस्तित्व को समेटने की यह सबसे मु मुकम्मल जगह है—इसकी गहराई में उतरकर खुद को तलाश लिया जाए।

लेकिन यह विडंबना ही है कि इस ब्रह्मांडीय शांति में खुद को विसर्जित करने की उस तीव्र अकुलाहट को समाज और दुनिया की भाषा में 'आत्महत्या' का नाम दे दिया जाता है।

एक तरफ प्रकृति का वह मौन आमंत्रण है, जो रूह को अपनी ओर खींचता है; और दूसरी तरफ यह कठोर सामाजिक यथार्थ है, जो इस तड़प को महज़ एक अंत मान लेता है।

उस पतली सी सीमा पर खड़े होकर यह सोचना भी हैरान करता है कि मुक्त होना और मिट जाना—आखिर इन दोनों के बीच की दूरी कितनी कम है!

मुझे घंटों नर्मदा तट पर बैठना बहुत अच्छा लगता है। उसकी कलकल करती धार में छिपे अनकहे शब्दों को पढ़ना और महसूस करना सुकून देता है।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह सदियों से बहुत कुछ कहना चाह रही है, इस बहते नीर के भीतर अनगिनत कहानियाँ दबी हैं—लेकिन अफ़सोस, कोई सुनने वाला ही नहीं है!

हम आधुनिकता की दौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि प्रकृति के मौन को सुनना भूल गए हैं। लेकिन मैं उसे सुनना चाहता हूँ, उसकी इस मौन भाषा को पढ़ना चाहता हूँ।

यही कारण है कि जब भी जीवन की भागदौड़ से समय मिलता है, मैं सब कुछ छोड़कर खिंच चला आता हूँ उसी के तट पर।

बिना किसी तामझाम के, बस बैठ जाता हूँ। और यकीन मानिए, जब रेवा की ठंडी हवा और उसकी लहरों की आवाज़ कानों से टकराती है, तो लगता है कि दुनिया के तमाम बड़े भाषणों से ज़्यादा सच इस बहते हुए पानी में दर्ज है।

जब मैं बैठता हूँ उन पत्थरों पर, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो नर्मदा अपनी मद्धम लहरों में मुझे कोई सदियों पुराना सत्य समझा रही हो। वह सिर्फ जल का प्रवाह नहीं, इस प्राण-प्रतिष्ठा की जीवंत धड़कन है।

क्या कभी आपने भी महसूस किया है उस मौन संवाद को? क्या आपने कभी सुनी है उसकी अनसुनी आवाज़?

कभी फुर्सत मिले, तो जाइएगा ज़रूर। और हाँ, जाने से पहले अपने पूर्वाग्रह और वो 'विज्ञान वाली पट्टी' घर पर ही छोड़कर जाइएगा।

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