यदि शहर की वर्तमान स्थितियों का अवलोकन किया जाए तो पाएंगे कि, लोगों की माँग और आंकाक्षाँए बढ़ रही है ,लेकिन गरीबी को मिटाने के धरातलीय स्तर पर पर्याप्त प्रयास नहीं किए जा रहे है, यह एक बड़ी विडंबना है।
होटल,ढाबों, रेस्टोरेंट इत्यादि अनेक स्थानों पर देखें तो कम पैसे में छोटे-छोटे बच्चों से उनकी क्षमता से अधिक काम लिया जाता है।जिसकी सबसे बड़ी वजह अशिक्षा और गरीबी है।
समाज और अर्थव्यवस्था की विसंगतियाँ का खामियाजा महिलाओं को भी उठाना पड़ रहा है।
मजदूरी करने वाली महिलाओं का बड़ा हिस्सा झुग्गी-बस्तियों में रह रहा है।अधिकांश गरीब महिलाएं पहले से ही बदतर आर्थिक स्थिति में जीवन गुजार रही हैं।
बेरोजगारी ने युवाओं के स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर गंभीर संकट पैदा कर दिया है।शासकीय नौकरियों के प्रति आकर्षण तथा गलत शासकीय नीतियों ने स्थितियों को और भी वीभत्स बना दिया है।
शासन और प्रशासन अपने दावों में अक्सर बखान करता है कि,गरीबी कम हो रही है,हालाकी यह समझ के परे है कि, आज जब बेरोजगारी बड़ रही है ,तब गरीबी कैसे कम होने का दावा किया जा सकता है?
स्थानीय राजनीतिक दल और जन प्रतिनिधि बेरोजगारी और मंहगाई के मुद्दे नहीं उठा पा रहे हैं!बेहद गंभीर हालात के बावजूद भी गरीबी ,मंहगाई,अशिक्षा मुख्य मुद्दा क्यों नहीं बन पा रहा है?
आज हताश बेरोजगार युवा अन्य शहरों/जिलों का रुख कर रहे हैं। जिले के ग्रामीण अंचलों में मनरेगा जैसी योजना के बावजूद भी गांव से मजदूरों का पलायन नहीं रुका है।
नरसिंहपुर जिले के शहरी और ग्रामीण अंचलों में जैसे हालात दिखाई दे रहे हैं,असल में स्थिति उससे कहीं ज्यादा खराब है।
मजदूरों की बेबसी और भूख से बेहाल बच्चों का दर्द समझने का सरकारी दावा एक छलावा है।हकीकत तो यह है कि, आज मुट्ठी भर लोग भी गरीब के प्रति दया नही दिखाते है,और जो दया दिखाते भी हैं, तो सोशल मीडिया पर उसका ऐसा ढिंढोरा पीटते हैं कि, संवेदन शील व्यक्ति की आत्मा शर्मा जाए!
जिले वासियों के प्रति दायित्व को निभाने के नाम पर महज ढकोसले और आडंबर रचे गए हैं।बावजूद इसके जिम्मेदारों को मूर्खता एवं लापरवाही का अहसास नही है।
