नरसिंहपुर।
कलेक्टर रोहित सिंह और पुलिस अधीक्षक विपुल श्रीवास्तव के कार्यकाल की यदि समीक्षा की जाए , तो हम पाते हैं की आकर्षक व्यक्तित्व के धनी पुलिस अधीक्षक अपनी सख्त कार्यवाही के चलते आम जनता के बीच अपनी पैठ तो बना सके, किंतु आम जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतर सके यह अहम सवाल है ।
छूट पुट घटनाओं को छोड़ दें तो पाते हैं कि, पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में पुलिस की टीम ने कई सकारात्मक कार्यवाहियों को अंजाम दिया।जिसका श्रेय पुलिस अधीक्षक विपुल श्रीवास्तव को जाना स्वाभाविक है।
हालाकी जिलेवासी अवैध मादक पदार्थों की बिक्री को लेकर अवश्य रोष जाहिर करते हैं।आज शहर और गांव के हर हिस्से में गांजा,पाउडर और अवैध शराब इत्यादि की बिक्री की चर्चाएं जोरों पर हैं।
जिले में शांति व्यवस्था कायम करने वाले, पुलिस अधीक्षक क्या नशे को लेकर कोई ठोस कार्यवाही कर पाएंगे?क्या शहर की गलियों से नशा माफिया को जड़ से उखाड़ दिया जाएगा?यह तो खुद पुलिस अधीक्षक या आगामी समय ही बता सकता है।
वहीं कलेक्टर सेंड द पिक कैम्पेन के माध्यम से जिले वासियों के बीच जागरूकता फैलाने में कामयाब रहे ।दिव्यांगो,बच्चों और बुजुर्गों को लेकर कलेक्टर रोहित सिंह की सहृदयता को सहज ही पहचाना जा सकता है।किंतु वहीं दूसरी ओर अधिकारियों पर भी सख्ती बरतने में भी कलेक्टर कोई कोताही नहीं बरतते हैं। भू माफिया पर शिकंजा कसते हुए कलेक्टर रोहित सिंह ने सख्त कार्यवाही कर जिले के अनेक हिस्सों से शासकीय भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराकर आम जनता के बीच अपनी धाक स्थापित की है।हालाकी अब भी आंतरिक ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक विसंगतियां और विषमताएं मौजूद है।लगातार भ्रष्टाचार एवम जनहित की समस्याओं को लेकर शिकायतों की लंबी फेहरिस्त बताती है कि अब भी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं,किंतु आम जनता के लिए यह सकारात्मक पक्ष है की कलेक्टर रोहित सिंह अपनी जिम्मेदारियों को लेकर गंभीर है,जिसकी झलक अक्सर जन सुनवाई के दौरान देखने को मिलती है।
तमाम राजनैतिक और आंतरिक दबावों के बीच काम करना बेहद मुश्किल होता है और वर्तमान दौर को देखते हुए इस तरह की बातों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।विकास प्रक्रिया में यदि कई बार बाधा उत्पन्न होती है तब इसके आंतरिक कारणों में चेन की कमजोर कड़ी शामिल होती है।
इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है की,कई बार अधीनस्थ कर्मचारियों की लापरवाही पूर्ण कार्यशैली का खामियाजा भी भुगतना पड़ता है।
जब इस बारे में हमने युवाओं के कुछ समूहों से बात की तब उनके द्वारा कहा गया कि कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक का प्रत्येक घटना स्थल पर मौजूद होना संभव नहीं है,ऐसे हालात में अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा कई बार जो रिपोर्ट,तथ्य और आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं उनके निष्पक्ष होने की संभावना कम हो सकती है, वस्तुतः ऐसी स्थिति में न्याय भी प्रभावित हो सकता है।इसलिए अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अनुशासित और संयमित आचरण हेतु प्रेरित करने की दिशा में त्वरित कदम उठाए जाने चाहिए।
क्यों की अब भी जिले को विकास पथ पर दौड़ने के लिए और अधिक गति की आवश्यकता है।आम आदमी आज भी न्याय की उम्मीद लगाए हुए है।जिले की आम जनता का एक बड़ा वर्ग शिकायतों की कतार में अपनी बारी आने का इंतजार कर रहा है।
