नरसिंहपुर।
90 के दशक के नरसिंहपुर शहर की तस्वीर आज भी जहन में उतरते ही एक अलग ही सुखद अहसास होता है।
हाथ का बुना स्वेटर,चोरी से आम तोड़ना,गिल्ली डंडा,पतंग काटने की होड़,अस्सी का दशक याद दिलाती चाय की गुमटियां,और भी न जाने कितना कुछ है लिखने के लिए।
इस दौरान शहर आंतरिक बदलाव के दौर से गुज़र रहा था।जीवन शैली में बदलाव,खान पान ,रहन सहन के साथ ही बोल चाल की भाषा में बदलाव भी दिखाई दे रहे थे।
धीरे-धीरे ही सही, मध्यमवर्गीय परिवारों की सोच में भी आमूल चूल परिवर्तन के असर से शहर अछूता नहीं रहा।
क्षेत्रीय रहवासियों के सामूहिक पिकनिक के स्थान पर किट्टी पार्टी ने कब्जा कर लिया था।
हालाकी इन सामाजिक बदलाव के साथ शहर भी करवट बदल रहा था।
इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया में हो रहे प्रयोगों और बाज़ार में आ रहे नए-नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने ना सिर्फ शहर के बाजार की खूबसूरती बढ़ाई बल्कि शहर के विकास को पंख लगाने का काम किया।
नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण की आंधी ने मध्यमवर्गीय परिवारों को तमाम सुख सुविधा के साधन जुटाने के अवसर उपलब्ध कराए।
निश्चित रूप से यह विकास सुखद है।
नब्बे के दशक और आज के आम आदमी में फर्क तो नजर आता है?
अगले अंक में जारी -: