नर्मदा जल से मिलता है जिद्दी मस्सों से छुटकारा?
मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी के तटों पर एक ऐसा ही दावा पीढ़ियों से चला आ रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि शरीर पर उगने वाले जिद्दी मस्सों से छुटकारा पाने के लिए नर्मदा के घाट पर जाकर उड़द की दाल और ‘घघरिया-फरिया’ अर्पित करने की जरूरत होती है।
आखिर क्या है इस लोक-विश्वास के पीछे की सच्चाई? क्या यह सिर्फ एक अंधविश्वास है या इसके पीछे छिपा है कोई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलू? हमारी इस स्पेशल रिपोर्ट पढ़िए..."
लोग कहते हैं कि कच्ची उड़द की दाल लीजिए, साथ में एक छोटी सी 'घघरिया-फरिया' लीजिए—यानी छोटे बच्चों के वो पारंपरिक छोटे-छोटे कपड़े—और चुपचाप जाकर नर्मदा मैया को अर्पित कर दीजिए।
इसके कुछ अपने नियम हैं।
पीड़ित व्यक्ति नर्मदा घाट पर पहुँचता है, स्नान करता है और अपने शरीर के मस्सों को याद करते हुए इन चीज़ों को नर्मदा जल में अर्पित कर देता है।
पहला नियम—यह काम बिल्कुल चुपचाप, गुप्त रूप से होना चाहिए।
दूसरा—जब आप दाल और वो फरिया पानी में प्रवाहित कर रहे हों, तो किसी से रास्ते में बात नहीं करनी।
और तीसरा और सबसे दिलचस्प नियम—जब आप अर्पित करके लौट रहे हों, तो पीछे मुड़कर बिल्कुल नहीं देखना है!
अब सोचिए। सुनने में कितना अजीब लगता है ना? एक आधुनिक दिमाग कहेगा—"अरे भाई, पीछे मुड़कर न देखने से मस्से का क्या ताल्लुक़? उड़द की दाल पानी में बह गई तो उससे चमड़ी की बीमारी कैसे ठीक हो जाएगी?"
लेकिन ज़रा रुकिए। क्या हमने कभी यह सोचा कि यह सिर्फ एक टोटका नहीं है, बल्कि यह उस समाज का अपनी नदी के साथ एक संवाद है?
जब हमने डर्मेटोलॉजिस्ट यानी त्वचा विशेषज्ञों से बात की, तो उनका नज़रिया बिल्कुल अलग था। विशेषज्ञों का कहना है कि मस्से मूल रूप से ह्यूमन पैपिलोमावायरस के संक्रमण की वजह से होते हैं। कई बार शरीर की इम्युनिटी मजबूत होने पर ये मस्से खुद-ब-खुद ठीक हो जाते हैं—जिसे मेडिकल साइंस की भाषा में 'स्पॉन्टेनियस रिग्रेशन' कहा जाता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि लोग अक्सर इस नेचुरल बायोलॉजिकल प्रक्रिया को इन पारंपरिक टोटकों या अनुष्ठानों से जोड़कर देखने लगते हैं।"
लेकिन सवाल यह है कि जब कोई इंसान डॉक्टर के यहाँ चक्कर काटकर थक जाता है, जब उसकी जेब ढीली हो जाती है, और उसे कोई राहत नहीं मिलती—तब वह अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर नर्मदा के पास क्यों जाता है?
क्योंकि नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं है। इस देश में नदियाँ सिर्फ पानी नहीं बहतीं, नदियाँ लोगों की मनोचिकित्सक होती हैं। जिसे आप 'प्लेसबो इफ़ेक्ट' कहते हैं, उसे हमारे गाँव के लोग 'श्रद्धा' कहते हैं।
जब कोई इंसान अपनी हर परेशानी अपनी ‘नर्मदा मैया’ के चरणों में समर्पित कर देता है, तो उसका मानसिक तनाव कम होता है। मन को मिलने वाली उस शांति का असर सीधे तौर पर उसकी शारीरिक सेहत और इम्युनिटी पर पड़ता है। नर्मदांचल के लोगों के लिए माँ नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि उनकी हर समस्या का अंतिम और सबसे अचूक समाधान है।"
