एक तरफ जहां सरकारें करोड़ों रुपए खर्च कर स्वच्छता और शहर के सौंदर्यीकरण पर योजनाएं और जागरूकता अभियान चला रही है वहीं दूसरी ओर नरसिंहपुर नगर पालिका प्रशासन लोगों की जान से खिलवाड़ करता नज़र आ रहा है।
मुख्य मार्ग को छोड़ दें तो अंदरूनी इलाकों में हालात बदतर है। कलेक्टर रोहित सिंह द्वारा चलाए गए सेंड द पिक केम्पेन से एक बदलाव की उम्मीद स्थानीय निवासियों में दिखाई दी थी किंतु केम्पेन के ठंडे बस्ते में डाल दिए जाने से शहर में गंदगी और संक्रमण फैल रहा है।आवारा पशुओं के झुंड खाने की तलाश में कचरे के ढेर में तक पहुंच जाते हैं जिसकी वजह से दुर्घटना की संभावना तो बड़ ही जाती है साथ ही पशुओं के पालिथिन खाने से पशु की असमय मौत के मामले भी बड़ जाते हैं।
शहर के पार्कों की दिवालों पर पंपलेट से ढककर पार्क को बदसूरत बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।मुख्य मार्ग पर डिवाईडर के बीच लगे बिजली के खमभे और चौराहों पर फ्लेक्स की विभागीय कार्यवाही पर आश्चर्य करने के लिए मजबूर कर देते हैं।
सड़कों पर घूमते आवारा पशु बच्चों और महिलाओं के लिए खासा सरदर्द साबित होते हैं किंतु नगर पालिका प्रशासन द्वारा नाम मात्र की कार्यवाही कर अपने कर्तव्यों से इति श्री कर ली जाती है।कभी कुछ पशुओं को गौशालाओं और शहर की बाहरी सीमाओं तक पहुंचा भी दिया जाता है लेकिन कुछ ही दिनों में दोबारा पशुओं के झुंड सड़क पर उत्पात मचाते हुए दिखाई देने लगते हैं।
जल है तो जीवन है का नारा लगाने वाली नगर पालिका की लापरवाही का खमियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा।अनेक सरकारी नलों की टोंटियां गायब हो गई घंटो सड़कों और नालियों में पानी बहता रहता है किंतु कोई सुध लेने वाला दिखाई नहीं देता।
कुछ ऐसे ही हालात शहर की सड़कों के भी है।पहले ही शहर में कई जगहों पर सड़कें अपनी बदतर स्थिति में है, उस पर सीवर लाइन के नाम पर जो लीपापोती की गई है, वह काबिले तारीफ है।सड़कें अपना मुलस्वरूप और सुंदरता खो चुकी हैं।क्या नगर पालिका प्रशासन यह बता पाएगा की सड़कों की बदहाली के चलते आगामी बारिश में दुर्घटनाओ में वृद्धि की वजह से होने वाले नुकसान का जिम्मेदार कौन होगा?।