पत्रकारिता खतरे में है?
DPDP एक्ट, निजता का अधिकार और भ्रष्टाचार के खिलाफ उठती कलम की चुनौती
एक पत्रकार जब किसी ग्राम पंचायत के सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज भुगतान पर सवाल उठाता है, तो वह केवल एक बिल की जांच नहीं कर रहा होता। वह उस व्यवस्था की जवाबदेही तलाश रहा होता है, जिसके संचालन के लिए जनता अपनी मेहनत की कमाई से टैक्स चुकाती है।
जब किसी मजदूर के नाम पर भुगतान दर्ज हो, लेकिन मजदूर कहे कि उसे पैसा मिला ही नहीं; जब किसी निर्माण कार्य पर लाखों रुपये खर्च होने का दावा हो, लेकिन जमीन पर काम दिखाई न दे; जब सरकारी दस्तावेजों में दर्ज आंकड़े और गांव की वास्तविकता एक-दूसरे से मेल न खाएं—तब पत्रकार का सवाल केवल पत्रकार का निजी सवाल नहीं रह जाता। वह पूरे समाज का सवाल बन जाता है।
लेकिन अब इस सवाल के सामने एक और सवाल खड़ा हो रहा है—क्या भविष्य में पत्रकार इन दस्तावेजों की पड़ताल उतनी स्वतंत्रता से कर पाएगा, जितनी स्वतंत्रता एक लोकतंत्र में आवश्यक है?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, यानी DPDP Act, 2023 ने इसी बहस को गंभीर बना दिया है।
यह कानून नागरिकों की डिजिटल निजता की रक्षा करने के उद्देश्य से बनाया गया है। पहली नजर में इसका उद्देश्य उचित दिखाई देता है। किसी व्यक्ति की निजी जानकारी का अनधिकृत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। किसी के बैंक खाते, पहचान संबंधी विवरण या निजी जीवन की जानकारी को उसकी इच्छा और कानूनी आधार के बिना सार्वजनिक करना उचित नहीं है।
लेकिन लोकतंत्र में हर कानून के उद्देश्य के साथ-साथ उसके प्रभावों पर भी विचार करना आवश्यक है।
विशेषकर तब, जब सवाल उस पत्रकारिता का हो जो सत्ता से जवाब मांगती है, सरकारी फाइलों की धूल झाड़ती है और उन तथ्यों को सामने लाने का प्रयास करती है, जिन्हें सामने आना चाहिए।
1. पत्रकारिता का काम केवल खबर लिखना नहीं, व्यवस्था से सवाल करना है
पत्रकारिता को अक्सर खबर प्रकाशित करने तक सीमित समझ लिया जाता है। जबकि उसका वास्तविक महत्व वहां शुरू होता है, जहां सामान्य व्यक्ति की पहुंच समाप्त हो जाती है।
एक ग्रामीण नागरिक को यह पता नहीं होता कि उसकी ग्राम पंचायत को कितनी राशि मिली, किस काम के लिए मिली और खर्च किस आधार पर दिखाया गया। वह नहीं जानता कि किसी सड़क के निर्माण का भुगतान कितना हुआ, नाली बनाने के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई या किसी सरकारी योजना के अंतर्गत किस व्यक्ति के नाम पर भुगतान दर्ज किया गया।
पत्रकार इन प्रश्नों के उत्तर तलाशता है।
वह सरकारी आदेश पढ़ता है, बिल और वाउचर देखता है, संबंधित व्यक्तियों से बातचीत करता है, जमीन पर जाकर काम की वास्तविक स्थिति जांचता है और फिर उपलब्ध तथ्यों के आधार पर खबर तैयार करता है।
यह प्रक्रिया हमेशा आसान नहीं होती। कई बार दस्तावेज प्राप्त करने में कठिनाई आती है। कई बार अधिकारी जवाब नहीं देते। कभी शिकायतकर्ता पीछे हट जाता है, तो कभी कोई व्यक्ति सामने आकर अपनी बात कहने से डरता है।
ऐसी परिस्थितियों में दस्तावेज, गवाह और स्वतंत्र सत्यापन पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत बन जाते हैं।
यदि इसी प्रक्रिया में कानूनी अनिश्चितता इतनी बढ़ जाए कि पत्रकार को हर सार्वजनिक रिकॉर्ड के प्रकाशन से पहले मुकदमे का भय सताने लगे, तो उसका प्रभाव केवल मीडिया तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर उस नागरिक पर भी पड़ेगा, जो सरकारी व्यवस्था से जवाब मांगना चाहता है।
इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता को केवल पत्रकारों की सुविधा के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह नागरिकों की जानकारी पाने की क्षमता और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही से भी जुड़ी हुई है।
2. DPDP एक्ट आखिर है क्या?
DPDP Act, 2023 भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून है। इसका उद्देश्य डिजिटल व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण को नियंत्रित करना और व्यक्तियों की निजी जानकारी की सुरक्षा के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करना है।
इसके अंतर्गत व्यक्तिगत डेटा का संग्रह, उपयोग, सुरक्षा और उससे संबंधित अधिकारों के लिए विभिन्न प्रावधान बनाए गए हैं। इसके साथ डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम, 2025 भी अधिसूचित किए गए।
इस कानून की जरूरत को समझना मुश्किल नहीं है।
आज किसी व्यक्ति की पहचान, बैंकिंग विवरण, मोबाइल नंबर, डिजिटल गतिविधियां और निजी दस्तावेज अनेक संस्थाओं के पास उपलब्ध हो सकते हैं। इनका दुरुपयोग होने पर व्यक्ति को आर्थिक नुकसान, धोखाधड़ी, उत्पीड़न या निजता के उल्लंघन का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसे में डेटा संरक्षण आवश्यक है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यहां पैदा होता है।
यदि किसी पत्रकार को सरकारी धन के कथित दुरुपयोग की जांच करते समय ऐसे दस्तावेज मिलते हैं जिनमें व्यक्तिगत जानकारी भी मौजूद है, तो उसे उस जानकारी का इस्तेमाल किस सीमा तक करना चाहिए? क्या किसी रिकॉर्ड में व्यक्तिगत डेटा मौजूद होने से पूरा दस्तावेज सार्वजनिक चर्चा से बाहर हो जाना चाहिए? क्या सार्वजनिक धन के उपयोग की जांच और किसी व्यक्ति की निजी जानकारी के प्रकाशन को एक ही कसौटी पर परखा जा सकता है?
इन प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट और व्यावहारिक होने चाहिए।
DPDP एक्ट की धारा 17 में कुछ विशिष्ट छूटें हैं, लेकिन पत्रकारिता के लिए कोई सामान्य, स्पष्ट छूट नहीं दी गई है। यही वह बिंदु है, जिस पर मीडिया संस्थानों और डिजिटल समाचार प्रकाशकों ने चिंता व्यक्त की है।
यह भी समझना जरूरी है कि इस कानून के सभी प्रावधान एक साथ लागू नहीं हुए हैं। 13 नवंबर 2025 की अधिसूचना के अनुसार कई मुख्य प्रावधान 13 मई 2027 से लागू होने के लिए निर्धारित हैं। इसलिए वर्तमान में लागू प्रावधानों और भविष्य में लागू होने वाले प्रावधानों के बीच अंतर करना आवश्यक है।
3. मान लीजिए, पंचायत के वाउचर में किसी मजदूर का नाम दर्ज है
इस प्रश्न को किसी काल्पनिक उदाहरण के बजाय ग्रामीण पत्रकारिता की वास्तविक परिस्थितियों के माध्यम से समझना अधिक उपयोगी होगा।
मान लीजिए, किसी ग्राम पंचायत के रिकॉर्ड में एक मजदूर के नाम पर भुगतान दर्ज है। पत्रकार को संदेह होता है कि भुगतान वास्तविक काम के बदले नहीं किया गया।
पत्रकार संबंधित मजदूर से संपर्क करता है। मजदूर बताता है कि उसने वह काम नहीं किया और उसे पैसा भी नहीं मिला।
अब पत्रकार के सामने कुछ सवाल हैं।
क्या वह मजदूर का नाम प्रकाशित कर सकता है? क्या वाउचर दिखा सकता है? क्या भुगतान की राशि बता सकता है? क्या संबंधित पंचायत अधिकारी से सवाल पूछ सकता है?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक जैसा नहीं होगा।
यदि मजदूर की पहचान और बयान जनहित में महत्वपूर्ण हैं, तो उसका नाम प्रकाशित करने की आवश्यकता का मूल्यांकन किया जा सकता है। यदि नाम प्रकाशित करने से उसकी सुरक्षा या निजता पर अनावश्यक प्रभाव पड़ सकता है, तो पहचान छिपाना बेहतर हो सकता है।
वाउचर में बैंक खाता संख्या, आधार नंबर या निजी मोबाइल नंबर भी दर्ज हो सकता है। लेकिन इन विवरणों को प्रकाशित किए बिना भी भुगतान की राशि, तारीख और आधिकारिक प्रविष्टि के बारे में जानकारी दी जा सकती है।
यहीं पत्रकारिता की जिम्मेदारी और डेटा संरक्षण के उद्देश्य एक साथ काम कर सकते हैं।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता का अर्थ गैरजरूरी निजी जानकारी प्रकाशित करने की स्वतंत्रता नहीं है। उसी तरह निजता का अधिकार सार्वजनिक धन के उपयोग से संबंधित हर सवाल का स्वतः अंत भी नहीं होना चाहिए।
4. खतरा कानून से ज्यादा उसके इस्तेमाल की अनिश्चितता में हो सकता है
किसी कानून का प्रभाव केवल उसके लिखे हुए शब्दों से तय नहीं होता। यह भी महत्वपूर्ण होता है कि उसका पालन कैसे कराया जाता है, शिकायतों का निपटारा कैसे होता है और संबंधित व्यक्ति को अपने पक्ष में बात रखने का कितना अवसर मिलता है।
मान लीजिए, एक पत्रकार ने सरकारी भुगतान की जांच करके खबर प्रकाशित की। खबर में किसी अधिकारी का नाम है, भुगतान की राशि है और संबंधित दस्तावेज का वह हिस्सा दिखाया गया है जो आरोप को समझने के लिए आवश्यक है।
यदि संबंधित अधिकारी को लगता है कि खबर में उसकी व्यक्तिगत जानकारी का अनुचित इस्तेमाल हुआ है, तो वह कानूनी उपाय तलाश सकता है। लेकिन यदि व्यक्तिगत डेटा से संबंधित शिकायतों का दायरा अस्पष्ट हो, तो पत्रकार को यह समझने में कठिनाई हो सकती है कि किस स्थिति में प्रकाशन वैध है और किस स्थिति में जोखिम पैदा होगा।
यहां दो संभावित परिस्थितियों के बीच अंतर करना आवश्यक है।
पहली परिस्थिति में पत्रकार वास्तव में किसी व्यक्ति की निजी जानकारी का अनुचित इस्तेमाल करता है। ऐसे मामले में उचित कानूनी कार्रवाई का औचित्य हो सकता है।
दूसरी परिस्थिति में पत्रकार ने सार्वजनिक धन के उपयोग से संबंधित तथ्य प्रकाशित किए हैं, लेकिन संबंधित व्यक्ति निजी जानकारी या अन्य कानूनी प्रावधानों का हवाला देकर उस खबर को हटवाने का प्रयास करता है। ऐसे मामले में शिकायत की वास्तविक प्रकृति और उपलब्ध प्रमाणों की निष्पक्ष जांच आवश्यक होगी।
केवल शिकायत दर्ज होने से यह साबित नहीं होता कि पत्रकार ने कानून तोड़ा है। इसी प्रकार पत्रकार होने मात्र से किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार की अनदेखी करने का अधिकार भी नहीं मिल जाता।
लेकिन यदि कानून की व्याख्या और उसके अनुपालन में पर्याप्त स्पष्टता नहीं होगी, तो छोटे समाचार पोर्टलों के सामने एक व्यावहारिक समस्या खड़ी हो सकती है।
बड़े मीडिया संस्थानों के पास कानूनी सलाहकार, संपादकीय विभाग और मुकदमों से निपटने के संसाधन हो सकते हैं। स्वतंत्र पत्रकार या छोटे डिजिटल पोर्टल के पास अक्सर ये सुविधाएं नहीं होतीं।
ऐसी स्थिति में कानूनी नोटिस का खर्च, वकील की फीस और लंबे विवाद की आशंका ही पत्रकार पर दबाव डाल सकती है।
इसलिए पत्रकारिता के संदर्भ में स्पष्ट नियम और निष्पक्ष प्रक्रिया का महत्व और बढ़ जाता है।
5. क्या ₹250 करोड़ के जुर्माने का मतलब पत्रकार पर भी इतना ही जुर्माना लग सकता है?
DPDP एक्ट के कुछ उल्लंघनों के लिए अधिकतम ₹250 करोड़ तक के आर्थिक दंड का प्रावधान है। लेकिन इस आंकड़े को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि दंड किस उल्लंघन के लिए निर्धारित किया गया है और संबंधित व्यक्ति या संस्था की कानूनी भूमिका क्या है।
यह कहना गलत होगा कि किसी पत्रकार द्वारा किसी व्यक्ति का नाम प्रकाशित करते ही उस पर ₹250 करोड़ का जुर्माना लग जाएगा।
दंड की अधिकतम सीमा और किसी विशेष मामले में वास्तव में दंड लगाया जाना दो अलग बातें हैं।
फिर भी, छोटे डिजिटल समाचार पोर्टलों के लिए कानून की अनिश्चितता एक गंभीर चिंता हो सकती है। यदि उन्हें यह स्पष्ट न हो कि डेटा संरक्षण संबंधी कौन-सी जिम्मेदारियां उन पर लागू होती हैं, तो वे जरूरी खबरों को प्रकाशित करने में भी अतिरिक्त जोखिम महसूस कर सकते हैं।
यहां कानून बनाने और लागू करने वाली संस्थाओं के सामने एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है—निजता की सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए, लेकिन जनहित में तथ्य प्रकाशित करने वाले पत्रकारों के लिए भी कानूनी स्थिति यथासंभव स्पष्ट हो।
6. क्या सरकारी दस्तावेज प्रकाशित करना गैरकानूनी हो जाएगा?
इस प्रश्न का सीधा उत्तर है—नहीं, DPDP एक्ट को इस तरह नहीं समझना चाहिए कि हर सरकारी दस्तावेज का प्रकाशन प्रतिबंधित हो जाएगा।
लेकिन यह मानना भी सही नहीं होगा कि सरकारी कार्यालय से प्राप्त हर दस्तावेज का प्रत्येक विवरण बिना किसी सीमा के प्रकाशित किया जा सकता है।
किसी दस्तावेज की प्रकृति, उसमें मौजूद जानकारी, उसके प्राप्त होने का तरीका, संबंधित व्यक्ति की निजता और प्रकाशन का उद्देश्य सभी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, किसी सड़क के निर्माण पर खर्च हुई सरकारी राशि की जानकारी और किसी व्यक्ति के बैंक खाते का पूरा नंबर अलग-अलग प्रकृति की जानकारी हैं।
पत्रकार को यह जांचना चाहिए कि खबर के मूल प्रश्न का उत्तर देने के लिए कौन-सी जानकारी वास्तव में आवश्यक है।
यदि सार्वजनिक धन की जांच भुगतान की राशि और आधिकारिक प्रविष्टि से हो सकती है, तो बैंक खाते की पूरी संख्या प्रकाशित करने का औचित्य सामान्यतः नहीं होगा।
लेकिन यदि सरकारी रिकॉर्ड में किसी भुगतान की प्रविष्टि ही विवाद का केंद्र है, तो उसके प्रासंगिक हिस्से का सत्यापन और प्रकाशन जनहित में महत्वपूर्ण हो सकता है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी दस्तावेज के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने का अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि उसमें मौजूद प्रत्येक व्यक्तिगत विवरण को पुनः प्रकाशित करना उचित है।
यही तरीका जनहित और निजता के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।
7. RTI के अधिकार पर इसका क्या असर पड़ता है?
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 ने नागरिकों और पत्रकारों को सरकारी कामकाज से संबंधित जानकारी प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण कानूनी माध्यम दिया है।
DPDP एक्ट की धारा 44(3) के माध्यम से RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया, जो 13 नवंबर 2025 से प्रभावी हुआ। यह संशोधन व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना के अपवाद को प्रभावित करता है।
इस बदलाव को समझते समय दो बातों को अलग रखना जरूरी है।
पहली, किसी व्यक्ति की निजी जानकारी और सरकारी कामकाज से संबंधित जानकारी हमेशा एक ही चीज नहीं होती।
दूसरी, किसी रिकॉर्ड में व्यक्तिगत जानकारी होने से यह निष्कर्ष स्वतः नहीं निकलता कि उससे जुड़ी हर दूसरी जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की जा सकती।
पंचायत की पत्रकारिता में इसलिए सूचना मांगने का तरीका महत्वपूर्ण हो जाता है।
उदाहरण के लिए, पत्रकार को यदि किसी सड़क के निर्माण की जांच करनी है, तो वह स्वीकृत राशि, कार्यादेश, माप पुस्तिका, भुगतान की तारीख, उपयोगिता प्रमाणपत्र और संबंधित कार्य के पूर्ण होने की स्थिति से संबंधित रिकॉर्ड मांग सकता है।
इससे जांच का ध्यान सार्वजनिक खर्च पर रहता है।
यदि किसी रिकॉर्ड में निजी जानकारी है, तो उसके गैरजरूरी हिस्से को अलग करके शेष रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का अनुरोध किया जा सकता है। हालांकि संबंधित प्राधिकारी का निर्णय लागू कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर होगा।
इसका मतलब यह नहीं कि RTI का अधिकार समाप्त हो गया है। बल्कि यह कि व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित संशोधित प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए सूचना मांगने और उसके प्रकटीकरण का कानूनी मूल्यांकन करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
8. पत्रकारिता की स्वतंत्रता और नागरिक की निजता एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए
इस बहस में एक गलत धारणा यह बन सकती है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता की बात करने वाला व्यक्ति निजता के अधिकार का विरोध कर रहा है, या निजता की रक्षा की मांग करने वाला व्यक्ति पत्रकारिता पर प्रतिबंध चाहता है।
वास्तविकता इससे अधिक जटिल है।
एक नागरिक को अपनी निजी जानकारी के दुरुपयोग से सुरक्षा मिलनी चाहिए। किसी का आधार नंबर, बैंक विवरण या निजी संदेश केवल इसलिए सार्वजनिक नहीं किए जाने चाहिए कि किसी पत्रकार के पास वे उपलब्ध हैं।
दूसरी ओर, नागरिक को यह जानने का भी अधिकार है कि सार्वजनिक धन का उपयोग कैसे हुआ, सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचा या नहीं और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों ने अपने दायित्वों का पालन किया या नहीं।
लोकतंत्र में इन दोनों हितों का महत्व है।
कानूनी व्यवस्था का काम एक अधिकार को दूसरे के सामने पूरी तरह समाप्त कर देना नहीं, बल्कि ऐसा संतुलन बनाना है जिसमें नागरिक की निजता भी सुरक्षित रहे और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही भी बनी रहे।
इसीलिए पत्रकारिता से संबंधित कानूनों में स्पष्टता, उचित प्रक्रिया और जनहित को समझने की क्षमता महत्वपूर्ण है।
यदि किसी वास्तविक विवाद में व्यक्तिगत डेटा का उपयोग अनुचित पाया जाता है, तो उसके लिए उचित उपाय उपलब्ध होने चाहिए। लेकिन यदि किसी समाचार का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक धन और सरकारी जवाबदेही की जांच है, तो उस उद्देश्य को केवल निजी जानकारी का उल्लेख होने के कारण स्वतः संदिग्ध नहीं माना जाना चाहिए।
9. स्वतंत्र पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती
स्वतंत्र पत्रकारिता की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह कई बार उन मुद्दों पर ध्यान देती है, जिन्हें बड़े समाचार संस्थान पर्याप्त समय नहीं दे पाते।
गांव की टूटी सड़क, अधूरा निर्माण, पंचायत के भुगतान में अंतर, सरकारी योजना से वंचित परिवार या किसी स्थानीय कार्यालय की कथित अनियमितता—ये सभी विषय राष्ट्रीय स्तर की बड़ी खबरें नहीं दिखाई देते, लेकिन संबंधित गांव और उसके नागरिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
एक स्वतंत्र पत्रकार अक्सर खुद दस्तावेज जुटाता है, खुद लोगों से बात करता है, खुद तस्वीरें लेता है और खुद खबर लिखता है।
उसे ही कानूनी जोखिम समझना पड़ता है, शिकायतों का जवाब देना पड़ता है और कभी-कभी अपनी सीमित आर्थिक क्षमता में वकील की सलाह भी लेनी पड़ती है।
ऐसे पत्रकार के सामने यदि डेटा संरक्षण संबंधी जिम्मेदारियां अस्पष्ट हों, तो जोखिम केवल आर्थिक नहीं होगा। वह यह भी सोच सकता है कि जिस खबर को प्रकाशित करना आवश्यक है, क्या उसे प्रकाशित करने से अनावश्यक कानूनी परेशानी खड़ी हो जाएगी?
यह आशंका हर मामले में वास्तविक कानूनी खतरे का प्रमाण नहीं है। लेकिन पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए कानूनी स्पष्टता का महत्व इसी कारण समझ में आता है।
छोटे डिजिटल पोर्टलों को अनुपालन संबंधी जानकारी, सरल दिशानिर्देश और उचित कानूनी सहायता तक पहुंच मिलना उपयोगी होगा।
साथ ही, स्वतंत्र पत्रकारों को भी अपने काम के तरीके में सुधार करना होगा। केवल आरोप के आधार पर खबर प्रकाशित करने के बजाय दस्तावेजों की पुष्टि, जवाब लेने की प्रक्रिया और निजी डेटा को सुरक्षित रखने पर ध्यान देना चाहिए।
स्वतंत्रता और जिम्मेदारी एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। जिम्मेदार पत्रकारिता अपनी स्वतंत्रता को अधिक विश्वसनीय बनाती है।
10. क्या DPDP एक्ट के खिलाफ अदालत में चुनौती पत्रकारों को राहत दिलाएगी?
डिजिटल समाचार प्रकाशकों की ओर से कानून को चुनौती दिए जाने का महत्व इसी संदर्भ में है।
उनकी चिंता का एक प्रमुख हिस्सा यह है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट सामान्य छूट न होने से खोजी पत्रकारिता और जनहित में जानकारी प्रकाशित करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
लेकिन किसी कानून को अदालत में चुनौती दिए जाने और उस कानून के असंवैधानिक घोषित हो जाने के बीच बड़ा अंतर है।
अदालत किसी कानून के विभिन्न प्रावधानों, उनके प्रभाव, संवैधानिक अधिकारों और सरकार की दलीलों पर विचार कर सकती है। सुनवाई के दौरान अंतरिम राहत दी जा सकती है या नहीं भी दी जा सकती है। अंतिम निर्णय आने तक केवल याचिका दायर होने के आधार पर यह घोषित नहीं किया जा सकता कि कानून निष्प्रभावी हो गया है।
इसलिए पत्रकारों को अदालत की कार्यवाही पर नजर रखनी चाहिए, लेकिन किसी संभावित राहत को पहले से प्राप्त अधिकार मानकर नही।
