"बंधा में एक दुल्हन दो दूल्हे, विधायक विश्वनाथ जी ये बंटी-बबली देख लो!"(चांवरपाठा की सरकारी प्रेम लीला!)
क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी गाढ़ी कमाई के टैक्स का यह पैसा ज़मीन पर पहुँचते-पहुँचते किन-किन जेबों से होकर गुजरता है?
आज हम आपको मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले की ग्राम पंचायत बंधा की एक ऐसी तस्वीर दिखाने जा रहे हैं, जिसे देखकर आप हैरान भी होंगे और सोचने पर मजबूर भी कि सरकारी योजनाओं का यह कैसा 'माडल' है!
ज़रा अपनी स्क्रीन पर (या इन वाउचरों पर) नज़र डालिए। यह ग्राम पंचायत बंधा के खर्च का आधिकारिक वाउचर है।
वाउचर नंबर 5 (दिनांक 05/08/2026) इस पर लिखा है-प्रशांत नामदेव, कंप्यूटर ऑपरेटर मानदेय (माह जून + जुलाई)। राशि:8,000 रुपये।
वाउचर नंबर 12 (दिनांक 26/08/2026) इस पर लिखा है-प्रशांत नामदेव, कंप्यूटर ऑपरेटर मानदेय (माह अगस्त)। राशि: 4,000 रुपये।
अब आप पूछेंगे कि इसमें गलत क्या है? किसी कंप्यूटर चलाने वाले को 4,000 रुपये महीने का मानदेय दिया जा रहा है, तो इसमें खबर क्या है?
तो असली खबर यहाँ से शुरू होती है!
बंधा पंचायत का दिल बहुत बड़ा है! साहब थक न जाएँ, इसलिए शायद गाँव के ही कंप्यूटर दुकानदार 'प्रशांत नामदेव' पर पंचायत का प्यार इस कदर बरसा कि उन्हें बना दिया गया 'कंप्यूटर ऑपरेटर'!
ग्राम पंचायत बंधा में बृजकिशोर पटेल नाम के एक व्यक्ति पहले से ग्राम रोजगार सहायक' (GRS) के पद पर तैनात हैं। वे सरकार से बाकायदा हर महीने नियमित वेतन (मानदेय) लेते हैं। और मध्य प्रदेश शासन के नियमों के मुताबिक, ग्राम रोजगार सहायक का मुख्य काम ही पंचायत का ऑनलाइन डाटा फीड करना, समग्र पोर्टल चलाना, मनरेगा का काम देखना और कंप्यूटर ऑपरेट करना है।
जब कंप्यूटर चलाने के लिए एक सरकारी कर्मचारी पहले से तैनात है और सरकारी खजाने से वेतन उठा रहा है, तो फिर गाँव में कंप्यूटर की दुकान चलाने वाले एक प्राइवेट व्यक्ति 'प्रशांत नामदेव' को हर महीने 4,000 रुपये किस नियम के तहत दिए जा रहे हैं?
क्या बृजकिशोर पटेल जी सिर्फ हस्ताक्षर करने के लिए पदस्थ हैं? अगर पंचायत का सारा काम बाहर दुकान चलाने वाला व्यक्ति कर रहा है, तो फिर रोजगार सहायक का वेतन किस बात के लिए जा रहा है? और अगर रोजगार सहायक काम कर रहे हैं, तो फिर प्रशांत नामदेव के नाम से यह वाउचर क्यों काटे जा रहे हैं?
इन वाउचरों पर आप ग्राम पंचायत सचिव की सील और दस्तखत देख सकते हैं। आप सरपंच की मुहर देख सकते हैं।
यह कोई अनजाने में हुई चूक नहीं है। यह एक व्यवस्था है, जहाँ कागज़ बनते हैं, दस्तखत होते हैं, और जनता के विकास का पैसा 'मानदेय' के नाम पर बाँट दिया जाता है।
अगर आज आपने इस 'वाउचर लीला' पर सवाल नहीं पूछा, तो याद रखिए... कल चाय पिलाने, फाइल उठाने और कुर्सी साफ करने के लिए भी आपके गाँव के बजट से अलग-अलग 'ऑपरेटर' रख लिए जाएँगे और कागज़ों पर पैसा खत्म हो जाएगा।
