पत्रकार हैं या पार्टी प्रवक्ता?(विधायकों के हर पाप पर पर्दा डालने का ठेका...)
आज के इस विशेष रिपोर्ट में पर्दा उठाते हैं नरसिंहपुर की उस अनोखी पत्रकारिता से, जहां 'स्याही' से ज्यादा 'चरणों' की धुलाई पर जोर दिया जा रहा है!
भाई, मान लिया कि बधाई देना और खुशियां बांटना व्यक्तिगत रिश्ते हो सकते हैं, लेकिन जब आप जनता के चौथे स्तंभ होने का दावा करते हैं, तब चाटुकारिता और पत्रकारिता में फर्क मिट जाता है।
हाल यह है कि माननीयों के जन्मदिन या अन्य आयोजनों पर उनकी ऐसी-ऐसी चरण-वंदना और महिमामंडन देखने को मिलता है, जिसे देखकर खुद विधायक जी भी शर्मा जाएं।
इन दिनों नरसिंहपुर जिले की पत्रकारिता का जो नज़ारा देखने को मिल रहा है, उसे देखकर सिर्फ हंसी आती है या फिर लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की लाचारी पर तरस आता है।
सोचिए, कैसा अजीब वक्त आ गया है। जिस पत्रकारिता का काम था कि वह सत्ता से सवाल पूछे, जो डायरी और पेन लेकर पंचायतों में घूमती और पूछती कि भाई, कागजों पर बने कुएं से पानी बाहर क्यों नहीं आ रहा? गांव की सड़क पहली बारिश में ही क्यों बह गई? उस पत्रकारिता को अब फुर्सत ही नहीं है।
क्यों? क्योंकि विधायक जी का जन्मदिन जो है!
जब जन्मदिन हो, तो कलम क्या करे? स्याही तो वैसे भी सूख चुकी है, अब तो बस चरण वंदना बची है। फेसबुक खोलिए तो ऐसा लगेगा कि आप किसी जिले के अखबार को नहीं, बल्कि किसी राजनीतिक पार्टी के विज्ञापन विभाग का कोई आधिकारिक पैम्फलेट पढ़ रहे हैं। बड़े-बड़े अक्षरों में, फूलों के गुलदस्ते के पीछे छिपे हुए कुछ चेहरे दिखाई देंगे। वही चेहरे, जो कल तक खुद को 'निष्पक्ष पत्रकार' होने का तमगा पहनाए घूमते थे।
लेकिन मजाल है कि हमारे इन "तेजतर्रार" पत्रकारों के मुंह से पंचायतों की इस लूट पर एक भी तीखा सवाल निकल जाए! इनकी जुबान तब खुलती है, जब विधायक जी के जन्मदिन पर केक काटना हो, या फिर उनके स्वागत में होर्डिंग छपवाने हों। तब ये रिपोर्टर नहीं, बल्कि किसी राजनीतिक दल के अधिकृत 'सुपर प्रवक्ता' बन जाते हैं, जो विधायकों के हर पाप पर पर्दा डालने का ठेका लेकर बैठे हैं।
सवाल यह नहीं है कि कोई किसी को जन्मदिन की बधाई क्यों दे रहा है। सवाल यह है कि लोकतंत्र में जब आप खुद को 'जनता की आवाज' कहते हैं, तो आपकी यह आवाज सिर्फ चुनाव के वक्त या मंत्रियों के स्वागत में ही क्यों गूंजती है? जब जनता लुट रही होती है, तब आप चुपचाप ताली क्यों बजाने लगते हैं?
खैर, इतिहास बहुत बेदर्द होता है। वह सब दर्ज कर रहा है—कौन कलम का सिपाही था, और कौन सिर्फ सत्ता की चौखट पर माथा टेकने वाला एक अदना सा प्रवक्ता।
बाकी, आप खुद समझदार हैं... लिखते रहिए चरण वंदना के नए अध्याय!
आम जनता सब देख रही है और बहुत बारीकी से तौल रही है कि कौन कलम का सच्चा सिपाही है और कौन सिर्फ विज्ञापनों और राजनीतिक आकाओं की गोद में बैठकर अपनी रोटी सेक रहा है।
